19 नवंबर 2011

तफ्तीश-दिल्ली का डॉक्टर क्यों बना बीवी का कातिल




संपन्न और सुंस्कृत परिवार से ताल्लुक रखने वाले डॉक्टर चंद्र विभास और सुप्रिया तुषार की शादी एक-दूसरे की पसंद से हुई थी। दोनों चरित्र के धनी और काफी पढ़े-लिखे थे। चंद्र विभास दिल्ली के एक बड़े अस्पताल में सीनियर रेजीडेंट सर्जन था तो सुप्रिया ने इंजीनियरिंग और एमबीए का कोर्स कर रखा था। उन्हें न तो किसी चीज का अभाव था और ना किसी बात की परेशानी। लेकिन उनका साथ मात्र दस माह रहा क्योंकि सुप्रिया का कत्ल हो गया। जब कत्ल का खुलासा हुआ तो हत्यारा कोई और नहीं चंद्र विभास ही था। आखिर चंद्र विभास ने ऐसा क्यों किया? और वह कैसे चढ़ा पुलिस के हत्थे? पूरी कहानी जानने के लिए घटना के अतीत में जाना होगा।
पारिवारिक पृष्ठभूमि
एलआईसी कॉलोनी, दुमका, जिला दुमका (झारखंड) में सपरिवार रहने वाले देवेन्द्र प्रसाद झारखंड बिजली बोर्ड में असिस्टेंट इंजीनियर थे। सुप्रिया उनकी इकलौती संतान थी। उसने बीएसी तक पढ़ाई दुमका से की। फिर उसने जयपुर से बीटेक करने के बाद बंगलौर के एक नामचीन संस्थान से एमबीए का कोर्स किया। जबकि, देवघर (झारखंड) के रहने वाले चंद्र विभास के पिता वीपी साहा झारखंड बिजली बोर्ड में अधीक्षण अभियंता के पद से हाल ही में सेवानिवृत्त हुए थे। वीपी साहा की चार संतानों तीन लड़के और एक लड़की में चंद्र विभास दूसरे नंबर पर था। उसने कलकत्ता मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस फिर असम मेडिकल कलेज, डिब्रुगढ़ से वर्ष 2009 में एमएस (मास्टर ऑफ सर्जन) किया था। फिलहाल वह जुलाई, 2010 से दिल्ली नगर निगम के अधीन संचालित दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल में सीनियर रेजीडेंट डॉक्टर के पद पर कार्यरत था।
पसंद से शादी
सुप्रिया और चंद्र विभास की शादी उन दोनों की पसंद से 22 नवंबर, 2010 को बड़ी धूमधाम से दुमका में हुई थी। देवेन्द्र प्रसाद ने शादी में सार्मथ्य से अधिक खर्च किया था। उन्होंने भरपूर दान-दहेज देने के अलावा विदाई के समय नव दम्पत्ति को सफेद कलर की एक आई-20 कार भी भेंट की जिसका नंबर यूपी-16 एबी-4351 था। शादी में मध्यस्थ की भूमिका दुमका शहर में रहने वाले चंद्र विभास के एक रिश्तेदार ने निभाई जो देवेन्द्र प्रसाद के अच्छे जानकार थे। शादी के कुछ दिन बाद ही चंद्र विभाष अपनी पत्नी सुप्रिया को अपने साथ दिल्ली ले आया था। दोनों किराये के मकान नंबर ए-24(प्रथम तल), हरिनगर, दिल्ली में रहते थे। मकान अनिल जैन का था जो पड़ोस में ही सपरिवार रह रहे थे।
रिश्ते में खटास
दिल्ली आने के कुछ दिन बाद ही सुप्रिया के प्रति चंद्र विभास के व्यवहार में अचानक बदलाव आ गया। अब उसे सुप्रिया पसंद नहीं थी। वह बात-बात पर सुप्रिया को ताना देता कि मैं तुमसे शादी कर फंस गया। तुम मेरे से शादी लायक नहीं थी। उसके अलावा वह सुप्रिया को नौकरी करने देने के पक्ष में भी नहीं था। उसका कहना था कि उसके घर की रिवाज नहीं है कि घर की महिला बाहर जाकर नौकरी करे। जबकि सुप्रिया इतनी पढ़ाई के बाद घर बैठकर अपनी डिग्रियां बेकार नहीं करना चाहती थी। नतीजन दोनों में मन-मुटाव शुरू हो गया। फिर चंद्र विभास ने सुप्रिया को तंग करना और उसके साथ मार-पीट करना शुरू कर दिया। सारी बात सुप्रिया टेलीफोन के माध्यम से अपने माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्यों को बताती रहती थी। दोनों की गृहस्थी ठीक तरह से चले इसलिए सुप्रिया के माता-पिता ने चंद्र विभास को समझाने का प्रयास किया लेकिन, उसके व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया। सुप्रिया के प्रति उसका नजरिया पूर्ववत रहा। उसने शादी के मात्र दो माह बाद ही 6 फरवरी, 2011 को सुप्रिया को मारपीट कर घर से निकाल दिया सुप्रिया विवश होकर मायके आ गई। सुप्रिया के माता-पिता के काफी अनुनय-विनय के बाद भी चंद्र विभास उसे लेने नहीं आया। फिर दोनों के रिश्तेदारों ने पहल कर उनकी सुलह करावाई। उसके बाद 10 जुलाई, 2011 को चंद्र विभास सुप्रिया को दिल्ली ले आया। इस बार सुप्रिया अपनी सारी डिग्रियां और लैपटाॅप मायके में ही छोड़ आयी थी, ताकि घर में क्लेश न हो। लेकिन जिस दिन वह दिल्ली आई उसी दिन किसी बात पर चंद्र विभास ने उसकी पिटाई कर दी। वह अब हमेशा सुप्रिया को जलील करने लगा था। सुप्रिया ने अपनी परेशानी माता-पिता को बतायी तो उसके पिता देवेन्द्र प्रसाद 20 जुलाई को दिल्ली आए। उन्होंने चंद्र विभास से याचना की कि वह उनकी बिटिया को परेशान न करे और दोनों को समझा-बुझाकर वे पुनः दुमका लौट गये।
माता-पिता से सुप्रिया का संपर्क टूटा
सुप्रिया रोजाना फोन कर मायके वालों को अपनी खैरियत की जानकारी देती रहती थी। 23 सितंबर की दोपहर करीब ढाई बजे उससे फोन पर अंतिम बार मां निमाषा प्रसाद की बातचीत हुई तब सुप्रिया ने मां को बताया था कि चंद्र विभास उसके साथ मारपीट कर रहा है। उसके बाद सुप्रिया का कोई फोन मायके वालों के पास नहीं आया। ऐसे में उसके माता-पिता की चिंता जायज थी। उन्होंने कई बार सुप्रिया के मोबाइल पर फोन कर उससे संपर्क करने की कोशिश की लेकिन हर बार उसका मोबाइल फोन बंद मिला। जबकि चंद्र विभास को फोन करने पर वह किसी न किसी बहाने सुप्रिया से बातचीत कराने में टाल-मटोल कर रहा था।
हत्या की जानकारी मिली
देवेन्द्र प्रसाद किसी अनहोनी की आशंका से 25 सितंबर की शाम करीब आठ बजे दिल्ली पहुंचे। वे चंद्र विभास के कमरे पर पहुंचे तो वहां ताला लगा मिला। जबकि उन्हें पड़ोसियों और मकान मालिक से पूछताछ में पता चला कि 23 सितंबर की दोपहर करीब दो बजे गली में सुप्रिया और चंद्र विभास के बीच झगड़ा हुआ था। उसके बाद सुप्रिया किसी को दिखायी नहीं दी थी। अलबत्ता यह जानकारी मिली कि चंद्र विभास उस दिन के बाद उस शाम करीब सात बजे कमरे पर दिखायी दिया था। इतना पता चलने पर देवेन्द्र प्रसाद ने अपने स्तर से चंद्र विभास की काफी तलाश की पर वह उन्हें रात्रि दो बजे तक नहीं मिला। चुकि उसका मोबाइल सुबह से बंद था, इसलिए फोन पर भी उससे संपर्क नहीं हो सका। फिर देवेन्द्र प्रसाद अजन्ता गेस्ट हाउस आ गये जहां वे रात को रुके। अगले दिन सुबह देवेन्द्र प्रसाद जब चंद्र विभाष के कमरे में पहुंचे तो वह उन्हे मिल गया। जबकि सुप्रिया मौजूद नहीं थी। उसके बारे में पूछने पर चंद्र विभाष ने बताया कि वह बीती शाम उससे झगड़ा कर कहीं चली गयी। बकौल चंद्र विभाष उसने सुप्रिया को ढ़ूढ़ने की काफी कोशिश की पर वह उसे नहीं मिली थी। लेकिन चंद्र विभास की यह बात देवेन्द्र प्रसाद को हजम नहीं हुई। उन्हें लगा कि उनकी बिटिया के साथ जरूर कोई अनहोनी घटना घटी है जिसे चंद्र विभास छिपा रहा है। फिर उन्होंने समझदारी से काम लेते हुए चंद्र विभास को विश्वास में लिया, ‘‘बेटा! यदि अनजाने में तुमसे कोई गलती हो गयी हो तो मुझे साफ बता दो। भरोसा रखो, मैं तुम्हें माफ कर दूंगा।’’ देवेन्द्र प्रसाद ने सहानभूति का महलम लगाया, ‘‘आखिर तुम मेरे बेटे हो। कोई भी बाप अपने बेटे का अनिष्ट नहीं चाहेगा।’’ इतना सुनते ही चंद्र विभाष की आंखें भर आयी, ‘‘पापाजी, मुझे माफ कर दो। मेरे से बहुत बड़ी गलती हो गयी। मैने सुप्रिया को...।’’ उसने वाक्य पूरा नहीं किया और फफक-फफक कर रो पड़ा। देवेन्द्र प्रसाद के दिल की धड़कन बढ़ गयी, ‘‘कहां है सुप्रिया?’’ उन्होंने घबराहट भरे स्वर में पूछा, ‘‘वह सही सलामत तो है?’’ चंद्र विभाष खामोश रहा। देवेन्द्र प्रसाद ने सवाल कई बार दोहराया, पर चंद्र विभास ने कोई जवाब नहीं दिया। वह बेतहाशा रोये जा रहा था। फिर देवेन्द्र प्रसाद को समझते देरी नहीं लगी कि सुप्रिया के साथ जरूर कोई अनहोनी घटना घट चुकी है। अब उनका धैर्य जवाब दे गया था, ‘‘तुमने सुिप्रया को मार डाला?’’ उन्होंने सख्त तेवर में चंद्र विभाष के चेहरे की तरफ देखा, ‘‘तुम खामोश क्यों हो?’’ उनकी आंखें भर आई, ‘‘मेरे सवाल का जवाब दो?’’ तो चंद्र विभाष ने रोते हुए हौले से कहा, ‘‘पापाजी, अब सुप्रिया इस दुनिया में नहीं है। मेरे से अनजाने में गलती हो गयी...मुझे माफ कर दो।’’ इतना सुनते ही देवेन्द्र प्रसाद कुछ पल के लिए बिल्कुल जड़वत हो गये। फिर रुद्व गले से बोले, ‘‘तुमने बहुत गलत किया। आखिर तुमने ऐसा क्यों किया?...।’’ और वह उसी समय हरिनगर थाने के लिए निकल गये।
कत्ल में पति गिरफ्तार
देवेन्द्र प्रसाद ने हरीनगर थाने के इंसपेक्टर (तफ्तीश) हरपाल सिंह को पूरी बात बताई तो इंसपेक्टर सिंह उसी समय दल-बल के साथ चंद्र विभास के घर के लिए रवाना हो गए जहां पहुंचने में उन्हें बमुश्किल पंद्रह मिनट का वक्त लगा। लेकिल चंद्र विभास घर से फरार मिला। तो पुलिस ने उसके मोबाइल फोन को सर्विलांस पर लगा दिया। फिर पुलिस ने मोबाइल फोन की लोकेशन की मदद से उसे उसी शाम उसे हरिनगर इलाके से गिरफ्तार कर लिया। थाने में लाकर जब उससे मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की गई तो उसने सुप्रिया की हत्या की बात कबूल कर ली। बकौल चद्र विभास उसने सुप्रिया की हत्या कर उसका शव इलाहाबाद के पास फेंक दिया था।
क्यों किया कत्ल?
चंद्र विभास ने सुप्रिया से मनमुटाव के तीन मुख्य कारण बताये। पहला, सुप्रिया शारीरीक संबंध बनाना नहीं चाहती थी। जब चंद्र विभास जबरदस्ती संबंध बनाने की कोशिश करता, तो वह उसे बलात्कार के मुकदमें मे फंसा देने की धमकी देती। उसने शादी के दस माह में मात्र तीन बार संबंध बनाये थे वह भी चंद्र विभास के काफी अनुनय-विनय के बाद। दूसरा, वह घर के काम-काज में कन्नी काटती थी। उसका कहना था कि वह तीसरी कक्षा से छात्रावास में रही है इसलिए उससे घर का काम-काज नहीं हो सकता। और तीसरा यह कि जब एक बार दोनों के बीच झगड़ा हुआ तो सुप्रिया ने चंद्र विभास को पकड़वाने के लिए पुलिस को बुला लिया था। बकौल चंद्र विभास इन्हीं कारणों से 23 सितंबर की रात करीब साढ़े नौ बजे उसका सुप्रिया के साथ झगड़ा हुआ तो सुप्रिया ने उसे तमाचा जड़ दिया। फिर उसका गुस्सा नियंत्रण में नहीं रहा और उसने सुप्रिया का सिर फर्श पर दे मारा। सुप्रिया बेहोश हो गयी। उसके बाद उसने चुन्नी से गला घोंटकर उसकी हत्या कर दी थी। चंद्र विभास ने बताया कि उसने सुप्रिया का शव उसी कार में डालकर इलाहाबाद जिले के हांडिया में एक फ्लाईओवर के नीचे फंेक दिया था जो कार सुप्रिया के पिता ने उसे भेंट की थी।
सुप्रिया का शव बरामद
पुलिस चंद्र विभास को साथ लेकर हांडिया पहुंची और उस जगह की निशानदेही की जहां चंद्र विभास ने सुप्रिया का शव फंेका था। वहां लाश नहीं मिली। फिर पुलिस ने इस बाबत हांडिया थाने के थानाध्यक्ष ए के निगम से संपर्क किया तो पता चला कि उन्हें उस जगह 25 सितंबर की सुबह एक महिला की लाश मिली थी जिसकी शिनाख्त नहीं होने पर उन्होंने उसका शव पहचान के लिए स्थानीय मुर्दाघर में सुरक्षित रखवा दिया था। इस जानकारी के बाद वह शव देवेन्द्र प्रसाद को दिखाया गया तो उन्होंने उक्त लाश की शिनाख्त सुप्रिया के रूप में कर दी। पुलिस को दिए चंद्र विभास के बयानों पर विश्वास करें तो सुप्रिया का चरित्र पति नहीं निबाहने वाली पत्नी के रूप में सामने आता हैं। खूब पढ़े-लिखे होने के बावजूद दोनों वैवाहिक संबंधों को निबाहने में कामयाब नहीं रहे।