17 अप्रैल 2012

परिवार खाने लगा खूबसूरत लड़कियों का जिस्म


ब्राजील पुलिस ने जॉर्ज बेल्त्राव नाम के 55 वर्षीय युवक को उसकी पत्नी 51 वर्षीय इसाबेल पाईरस और 25 साल की महिला मित्र ब्रूना डी सिल्वा को दो लड़कियों की हत्या और उनके जिस्म के टूकड़ों को खाने के आरोप में गिरफ्तार किया है। आरोप है कि दो लड़कियों को मार डालने के बाद इन लोगों ने उनके जिस्म के खूबसूरत अंगों को बारी-बारी से काटा भी और फिर घर के चूल्हे पर पकाकर उनके मांस को न सिर्फ अपनी डाइनिंग टेबल पर सजाया बल्कि उन्हें अपना निवाला भी बनाया है..मुमकीन है इन बातों पर एतबार करना थोड़ा मुश्किल हो..लेकिन ये बात सौ फीसदी सच है..आरोप है कि इन लोगों ने लड़कियों के जिस्म के खूबसूरत अंगों को फ्राइ कर बड़े ही चाव से खाया..और तो और लाश की बोटी-बोटी काटने और खाने के बाद बचे-कुचे हिस्से को इन्होंने अपने घर के पास ही दफन भी कर दिया...ब्राजील के गरानहुन्स में ये तीनों पिछले कई सालों से 5 साल के बच्चे के साथ एक ही छत के नीचे रहते थे..और बेल्त्राव का ब्राजील में ही होटल का कारोबार था..जहां खासकर फास्ट फूड पिज्जा,बर्गर आदि खाने पीने का सामान मिलता...इसी से इनकी रोजी रोटी चलती थी...कुल मिलाकर सब- कुछ ठीक-ठाक चल रहा था...और हंसी-खुशी इनकी जिंदगी कट रही थी लेकिन जल्द अमीर बनने की चाहत में जिंदगी एक अजीब मोड पर जा पहुंची..असल में तीनों ब्राजील की सेक्ट नामक संस्था से जुड़ गए...इस संस्था से जुड़े लोग नास्तिक होते है.. और इनका उपरवाले पर भरोसा नहीं होता ...साथ ही ये संस्था ब्राजील में बढती पॉपुलेशन पर लगाम लगाने के लिए भी योजना चला रही थी...बताया जाता है कि वहीं एक रोज इन्हें एक जादुई आवाज सुनाई दी..किसी ने इनसे कहा कि अगर वो अपने इलाके में रहने वाली लडकियों के खूबसूरत अंगों को काटकर खाए तो इनकी तकदीर बदल सकती है...और ताउम्र उनकी जिंदगी में कोई शैतानी साया दस्तक नहीं देगा...एक बार को तो इन्हें इस पर यकीन न हुआ लेकिन चूंकि ये बात इनके दिलो दिमाग पर हावी हो चुकी थी..लिहाजा इन्होंने एक सोची समझी साजिश के तहत लड़कियों को अपने जाल में फंसाना शुरू कर दिया...जॉर्ज बेल्त्राव निग्रोमौन्त,उसकी पत्नी इसाबेल पाईरस और उसकी रखैल ब्रूना डा सिल्वा..तीनों ने मिलकर न सिर्फ दोनों लड़कियों का कत्ल कर दिया बल्कि शैतानी साए से बचने के लिए उनके खूबसूरत अंगों को पकाकर खाया और खिलाया भी..लाश के बचे हुए हिस्से को इन लोगों ने घर के आंगन में ही दफन कर दिया..ताकि इनके गुनाह से कभी पर्दा ना उठ सके..इन लोगों ने सोचा था कि शायद इनकी असलियत कभी जमाने के सामने नहीं आ पाएगी लेकिन कहते हैं कि गुनहगार चाहे कितना भी शातिर क्यों न हो कोई न कोई सुराग छोड़ ही जाता है जो उसे सलाखों के पीछे पहुंचा देता है..असल में इनसे गलती ये हो गई कि इन लोगों ने जिन लड़कियों का कत्ल किया था लालचवश उन लड़कियों का एटीएम और क्रेडिट कार्ड भी अपने पास रख लिया...बाद में उन एटीएम कार्डस और क्रेडिट कार्डस से खरीदारी भी शुरू कर दी...बस यही बात इनके गले की फांस बन गई और ये लोग पहुंच गए कानून के शिकंजे में..मरने वाली लड़कियों के क्रेडिट कार्ड से खरीददारी की गई थी, जब पुलिस ने दुकानदार की मदद से मिले हुलिए के बिनाह पर इनमे से एक महिला को हिरासत में लेकर पूछताछ की गई तो फिर न सिर्फ उसने अपना गुनाह कबूल कर लिया...बल्कि इस वारदात में शामिल बाकी बचे दो लोगों का नाम भी पुलिस का बता दिया...पुलिस की माने तो अभी और 10 से ज्यादा लड़कियां संदिग्ध हालातों में लापता हैं और उन्हें शक है कि उनकी हत्या करने के पीछे भी इन्हीं लोगों का हाथ हो सकता है..फिलहाल पुलिस ने तीनों के खिलाफ अपहरण, हत्या और सबूत छिपाने सहित कई संगीन धाराओं के तहत मामला दर्ज कर लिया है...पुलिस को यकीन है कि आने वाले कुछ दिनों में दस लापता लड़कियां के बारे में भी पुख्ता जानकारी मिल जाएगी..

31 जनवरी 2012

शराबी पति बना काल, ली पत्नी की जान

गाजियाबाद के कविनगर थाना पुलिस ने देवीलाल नाम के शख्स को कत्ल के इल्जाम में गिरफ्तार किया है..इंसान से शैतान बने देवीलाल ने कत्ल भी किया तो अपनी बीवी का..पांच बच्चों के इस बाप ने अपने परिवार को अपने ही हाथों बर्बाद कर डाला..वारदात मंगलवार सुबह की है..जब कविनगर इलाके में रहने वाले लोगों की आंख खुली तो उनका सामना दिन की सबसे बुरी ख़बर से हुआ..देवीलाल ने अपनी 33 वर्षीय पत्नी रेखा की ईंट से पीट-पीटकर हत्या कर दी थी..
वारदात की ख़बर मिलने के बाद पुलिस मौके पर पहुंची और आरोपी देवीलाल को गिरफ्तार कर लिया..पुलिसिया पूछताछ में खुलासा हुआ कि देवीलाल की शादी रेखा से करीब आठ साल पहले हुई थी..रेखा से देवीलाल को पांच बच्चे थे..जिनमें एक दो महीने का बच्चा भी शामिल है..लेकिन बुरी आदतों की वजह से देवीलाल शराब का आदी हो गया था..मंगलवार सुबह जब देवीलाल ने शराब के लिए रेखा से रूपयों की मांग की तो दोनों में झगड़ा हो गया..आरोप है कि शराब के लिए पैसे ना मिलने से तिलमिलाए देवीलाल ने ईंट से अपनी बीवी पर जानलेवा वार कर दिया..जिससे रेखा की मौके पर ही मौत हो गई..
पुलिसिया तहकीकात में पता चला है कि देवीलाल मूलरूप से अलीगढ का रहने वाला है और गाजियाबाद के कविनगर में अपने पांच बच्चों और बीवी के साथ किराये के मकान में रह रहा था..रेखा देवीलाल की दूसरी पत्नी थी..जबकि देवीलाल की पहली पत्नी की मौत हो चुकी है..आरोप है कि पहली पत्नी का आरोप भी देवीलाल पर ही लगा था..हालांकि पुलिस इस सिलसिले में भी तहकीकात कर रही है..
बीवी का कातिल देवीलाल पुलिस के शिकंजे में है..जाहिर तौर पर कानून उसे उसके किये की सजा देगा..लेकिन बीवी को बेरहम मौत देकर देवीलाल ने जो गुनाह किया..उसकी वजह से ना केवल देवीलाल सलाखों के पीछे सजा काटेगा..बल्कि उसके गुनाह की सजा उसके मासूम बच्चों को भी भुगतनी पड़ेगी..

25 जनवरी 2012

बीवी की बेहयायी रास न आई

दक्षिण अफ्रीका के एक प्रमुख व्यवसायिक घराने से ताल्लुक रखने वाली निरंजनी काफी पढ़ी-लिखी, सरल, सहृदयी और बेपनाह हुस्न की मलिका थी। निःसंदेह उसकी शादी कोई बड़े नौकरशाह से अथवा किसी नामचीन अमीर घराने में होती। लेकिन उसने एक भारतीय नागरिक सुमित हांडा से प्रेम-विवाह किया, जिसकी हैसियत उसके परिवार के सामने कुछ भी नहीं थी। वह निरंजनी के पिता के फार्म में एक साधारण कर्मचारी था। शादी के बाद निरंजनी के परिजनों ने सुमित से घरजमाई बनने की पेशकश की, पर उसने साफ मना कर दिया। दोनों बेहद स्वाभिमानी और कर्मठ थे। उन्हें न कोई परेशानी थी, न किसी चीज का अभाव। इकलौता लड़का निर्वाण उनके प्यार की निशानी थी। उन्होंने शादी के करीब ढ़ाई वर्ष बाद दिल्ली को अपना नया आशियाना बनाया, जहां उन्हें अच्छी तनख्वाह पर मनलायक नौकरी मिल गयी। इसी बीच एक दिन अप्रत्याशित घटना घटी, जब सुमित हांडा स्थानीय थाने में पहुंचा और उसने आरोप लगाया कि उसकी पत्नी निरंजनी घर से लाखों रुपये के जेवरात व नकदी लेकर फरार हो गयी है। फिर पुलिस ने घटना की एक-एक कड़ी को जोड़ते हुए मामले का खुलासा किया, तो सभी भौंचक रह गये। निरंजनी घर से फरार नहीं हुई, उसका कत्ल कर उसके शव को ठिकाने लगा दिया गया था। हैरत की बात यह थी गुनाहगार कोई और नहीं, सुमित हांडा था। हत्या अबैध संबंध की परिणति थी। पूरी कहानी जानने के लिए घटना के अतीत में जाना होगा।
निरंजनी की गुमशुदगी दर्ज
2 नवम्बर, 2011 की सुबह करीब नौ बजे 31 वर्षीय एक युवक सुमित हांडा दक्षिणी पूर्वी दिल्ली स्थित पुल प्रह्लादपुर थाने पहुंचा। उसने थाने के एसएचओ इंसपेक्टर हरिश्चंद्र को बताया, सर, 30 अक्टूबर की शाम करीब छह बजे मेरी पत्नी निरंजनी ने मुझे धोखे से चाय में नींद की दवा पिला दी और लाखों की नकदी व गहने लेकर अपने किसी प्रेमी के साथ फरार हो गयी। मैने अपने स्तर से उसकी काफी तलाश की, पर वह नहीं मिली। कृपया उसकी गुमशुदगी रिपोर्ट दर्ज कर लें। यह सुनकर इंसपेक्टर हरिश्चंद्र हैरत में पड़ गये, ‘सिर्फ गुमशुदगी रिपोर्ट...। उन्होंने सरसरी निगाह से उसके चेहरे की तरफ देखा, बंधु, मामला तो चोरी का है। फिर सिर्फ गुमशुदगी रिपोर्ट... उनका सवाल था, ऐसा क्यों? इसपर युवक ने सफाई दी, सर, मै निरंजनी से बहुत प्यार करता हूं। इसलिए नहीं चाहता कि उसपर कोई परेशानी आये। यह बात अलग है कि उसने मेरे प्यार का यह सिला दिया। लेकिन मैं गलती मान लेने पर उसे माफ कर दूंगा। तो इंसपेक्टर हरिश्चंद्र ने सुमित के बयान पर थाने में निरंजनी की गुमशुदगी रिपोर्ट दर्ज कर ली।
मामले पर क्राइम ब्रांच की नजर
इस घटना की भनक कहीं से क्राइम ब्रांच(स्पेशल यूनिट) के सब इंस्पेक्टर रितेश कुमार को लग गयी। एस आई रितेश का माथा ठनका-‘पत्नी लाखों की नकदी व गहने लेकर फरार और रिपोर्ट गुमशुदगी की। जरूर कोई गड़बड़ है, जिसकी कानूनी लीपापोती करने की कोशिश की जा रही है।’ एस आई रितेश ने चालाकी से सुमित और निरंजनी के मोबाइल नंबर ले लिए। फिर सनलाइट कालोनी स्थित क्राइम ब्रांच के दफ्तर में आकर एस आई रितेश ने अपने इंसपेक्टर अनिल दुरेजा से इस बारे में चर्चा की, तो दुरेजा को रितेश की बातो में दम नजर आया। दुरेजा ने आला अघिकारियों से इजाजत लेकर अपने निर्देशन तथा सब इंसपेक्टर रितेश कुमार के नेतृत्व में एक विशेष टीम का गठन कर सावधानी पूर्वक मामले की पड़ताल शुरू कर दी।
कैसे मिला कत्ल का सुराग?
पुलिस टीम ने जांच के दौरान सबसे पहला काम यह किया कि दोनों मोबाइल नंबरों की लोकेशन और काल डिटेल निकलवा ली। उससे जानकारी मिली कि निरंजनी का फोन 29 अक्टूबर की रात 9 बजे से बंद था। बंद होने की उसकी लोकेशन घर के इलाके की थी। जबकि सुमित के फोन की लोकेशन 30 अक्टूबर की शाम करीब पांच बजे तक घर के इलाके की थी। उसके बाद उसके फोन की लोकेशन दिल्ली से राई(सोनीपत, हरियाणा) तक थी। मध्य रात्री के बाद पुनः उसके फोन की लोकेशन घर के इलाके की थी। सुमित ने इंसपेक्टर हरिश्चंद्र को बताया था, कि 30 अक्टूबर की शाम करीब छह बजे चाय पीने के थोड़ी देर बाद वह अचेत हो गया। उसे अगले दिन सुबह करीब पांच बजे होश आया, तो निरंजनी घर से फरार थी। जबकि घर में रखे लाखों की नकदी व गहने गायब थे। ऐसे में उस रात उसके फोन की लोकेशन घर के इलाके में होनी चाहिए, पर ऐसा नहीं था। यह रहस्य की बात थी। इसी बीच छह नवम्बर को सुमित पुश्तैनी घर आगरा चला गया, तो उसपर संदेह गहरा गया। पुलिस टीम का मानना था कि फिलहाल सुमित की प्राथमिकता निरंजनी की तलाश होना चाहिए था, न कि घर जाने की चिन्ता। अब पुलिस टीम उससे पूछताछ का मन बना बना चूकी थी। सुुुमित 10 नवम्बर को दिल्ली लौटा, तो 11 नवम्बर को क्राइम ब्रांच की टीम ने उसे पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया। मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ करने पर सुमित जल्द टूट गया। उसने खुलासा किया कि निरंजनी अब इस संसार में नहीं है, क्योंकि उसने 29 अक्टूबर की शाम घर में उसकी हत्या कर उसके शव को राई(सोनीपत, हरियाणा) के जंगल में ले जाकर जला दिया था। इस अपराध स्वीकारोक्ति के साथ ही पुलिस ने सुमित को गिरफ्तार कर, उसके खिलाफ पुल प्रह्लादपुर थाने निरंजनी की हत्या का मुकदमा अपराध संख्या 342/11 पर धारा 302, 201 भा. द. वि के तहत दर्ज कर लिया। अगले दिन यानी 12 नवम्बर को क्राइम ब्रांच की टीम ने सुमित को दिल्ली की साकेत कोर्ट में पेश कर, उसे सात दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया। रिमांड अवधि में सुमित ने पुलिस को राई के जंगल से निरंजनी के जले हुए शव के अवशेष बरामद करा दिये। साथ ही उसकी निशानदेही पर वारदात में इस्तमाल सामानों की भी बरामदगी हो गयी।
दंपत्ति की पृष्ठभूमि
मकान नंबर 50, ईएमआई इन्कलेव, आगरा(उत्तरप्रदेश) में सपरिवार रहने वाले श्रीराम हांडा के तीन संतानों में सुमित हांडा बड़ा था। उससे छोटा भाई अमित आगरा से एमटेक्् कर रहा था। जबकि बहन प्रीती छोटी थी। अमित और प्रीती अविवाहित थे। श्रीराम हांडा का सेना में राशन सप्लाई का काम था। अब वह समाजिक कार्यां में लगे थे। सुमित की मां कमलेश हांडा एक घरेलू महिला थी। सुमित ने 12वीं कक्षा तक पढ़ाई आर्मी स्कूल, आगरा से की। उसके बाद बीएससी(बैचलर आॅफ साइंस) आगरा कालेज, आगरा से किया। वर्ष 2000 में वह दिल्ली आ गया। दिल्ली में उसने वल्र्ड ट्रेड सेंटर से छह माह का ट्रेवल एजेंसी की ट्रेनिंग ली। वर्ष 2001 में उसे करोलबाग स्थित एक ट्रेवल एजेंसी में काम मिल गया। उसी दौरान उसने दो साल का फ्रेंच कोर्स कर लिया। वर्ष 2003 में उसे कंपनी की तरफ से बतौर मार्केटिंग मैनेजर थाईलैंड भेजा गया, जहां वह मात्र सात माह रहा। फिर नौकरी छोड़कर भारत आ गया। दरअसल थाईलैंड उसके स्वास्थ्य के अनुकूल नहीं था। दिल्ली आकर उसने एक दूसरी नामचीन ट्रेवल कंपनी ज्वाइन कर ली, जहां तनख्वाह मनलायक था। तभी उसकी मुलाकात दक्षिण अफ्रिका के एक प्रमुख व्यवसायी रामा पिल्लै से हुई, जो तब व्यवसाय के सिलसिले में भारत आए हुए थे। रामा पिल्लै का साडि़यों का आयात-निर्यात का व्यवसाय था। उसके अलावा उनकी दक्षिण अफ्रिका के डरबन शहर में भारतीय साडि़यों की एक थोक दुकान थी। मूलतः हैदराबाद शहर(भारत) के रहने वाले रामा पिल्लै ने करीब 40 वर्ष पूर्व दक्षिण अफ्रिका की नागरिकता ले ली थी। वे सपरिवार डरबन शहर में रहते थे। पहली मुलाकात में ही रामा पिल्लै को सुमित अपने काम का आदमी लगा। इसलिए उन्होंने उससे पूछ लिया, ‘‘मेरे पास काम करोगे?’’ तो सुमित ने फौरन हामी भर दी। इसपर रामा पिल्लै ने उसे भरोसा दिया, ‘‘तुम्हें जल्द डरबन बुला लेंगे।’’ उसके बाद सुमित फोन व अन्य माध्यमों से लगातार रामा पिल्लै के संपर्क में रहा। वर्ष 2005 मे रामा पिल्लै ने सुमित को डरबन बुला लिया और उसे अपनी दुकान में सेल्स एक्सक्यूटिव की नौकरी दे दी। रामा पिल्लै के दो संतान थे। लड़की निरंजनी बड़ी थी, जो कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद टूर एंड ट्रेवल्स का कोर्स कर रखी थी। फिलहाल वह एक नामी कंपनी में आॅफिस असिस्टेंट के पद पर कार्यरत थी। निरंजनी से छोटा भाई लिंगेश्वर डेंटिस्ट का कोर्स कर रहा था। जबकि रामा पिल्लै की पत्नी चारुमाला एक घरेलू महिला थी। डरबन में पहले से सुमित का एक दोस्त लक्ष्मण रहता था, जो सुमित के साथ दिल्ली में एक ट्रेवल एजेंसी में काम कर रखा था। हैदराबाद शहर का रहने वाला लक्ष्मण डरबन में एक ट्रेवल कंपनी में अच्छे पद पर था। वह एक किराए के मकान में अकेला रहता था, क्योंकि उसकी शादी नहीं हो रखी थी। लक्ष्मण ने सुमित से साथ रहने की पहल की, तो सुमित उसी के साथ रहने लगा।
मुलाकात, प्यार, शादी और बच्चा
रामा पिल्लै के पास काम के दौरान सुमित की मुलाकात निरंजनी से हुई। जल्द ही दोनों एक-दूसरे के बेहद करीब आ गये और उनके बीच प्यार का सिलसिला चल पड़ा। फिर उन्होंने शादी का निर्णय ले लिया। निरंजनी के परिजनों को इस शादी पर कोई आपत्ति नहीं थी। 5 फरवरी, 2007 को उनकी शादी हो गयी। शादी के बाद सुमित ने रामा पिल्लै का काम छोड़कर दूसरी कंपनी ज्वाइन कर ली। डरबन शहर में स्थित उस कंपनी का नाम ‘सेरेमपेडीटी टूर’ था। लक्ष्मण, सुमित और निरंजनी के साथ रहता था। शादी के बाद अक्टूबर,2009 में दोनों भारत आए, जहां से दोनों दिसंबर में पुनः डरबन लौट गये। अक्टूबर, 2010 में उन्हे एक लड़का हुआ, जिसका नाम निर्वाण रखा।
रिश्ते में खटास
पति सुमित हांडा के साथ निरंजनी
साथ रहने के दौरान निरंजनी के अवैध संबंध लक्ष्मण के साथ बन गये थे। एक दिन सुमित ने उन दोनों को आपत्तिजनक अवस्था में देख लिया। तो उसने निरंजनी को सही रास्ते पर लाने की बहुत कोशिश की, पर निरंजनी के व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया। उसका लक्ष्मण से रिश्ता पूर्ववत रहा। परिणाम यह हुआ कि उनके रिश्ते में खटास आ गयी। सुमित अपने इकलौटे बेटे से बहुत प्यार करता था, इसलिए वह बेटे की खातिर निरंजनी को छोड़ने के पक्ष में भी नहीं था। वह नहीं चाहता था कि उसका बेटा मां से मरहूम हो जाए। जबकि निरंजनी पर सख्ती इस भय से नहीं करता, क्योंकि वह उसे धमकी दे डालती, ‘‘तुम जानते हो कि मैं लाॅ ग्रेजुएट हूं। यदि तुमने परेशान किया, तो मैं तुम्हें जेल भिजवा दूंगी।’’ निरंजनी ने साफ कर दिया था कि लक्ष्मण उनके साथ ही रहेगा। अब निरंजनी को सुमित का तनिक भी भय नहीं था। फिर सुमित ने निरंजनी का लक्ष्मण से पीछा छुड़ाने के ख्याल से भारत लौटने का निर्णय ले लिया। हांलाकि निरंजनी भारत जाने के पक्ष में नहीं थी, पर सुमित ने उसे धमकी दी, ‘‘यदि तुमने साथ जाने से इंकार किया, तो मैं तुम्हारी असलियत परिजनों और रिश्तेदारों को बता दूंगा।’’ तो वह घबड़ाकर साथ भारत जाने को राजी हो गई। फिर दोनों जुलाई, 2011 में भारत आ गये। कुछ माह पुश्तैनी घर आगरा में रहे। उसके बाद वे अक्टूबर,2011 में दिल्ली आ गये। दिल्ली आते ही सुमित को राजौरी गार्डेन स्थित एक टेªवल कंपनी में आकर्षक सैलरी पर बिजनेस डेवलमेंट मैनेजर की नौकरी मिल गई। निरंजनी ने भी मालवीय नगर स्थित एक टेªवल कंपनी में काम पकड़ लिया। दोनो किराये पर फ्लैट नंबर 104, ब्लाक एफ 5, पुल प्रहलादपुर में रहते थे। इकलौटे बेटे की देखरेख के लिए सुमित ने छोटी बहन प्रीती को पास बुला लिया था।
हत्या की वजह
निरंजनी और लक्ष्मण फोन और अन्य माध्यमों से अब भी एक-दूसरे के संपर्क में थे। ज्यादातर दोनों विडियो कान्फ्रेंशिंग जरिए लाइव चैटिंग करते। यह बात सुमित को पता था, पर वह इसे लगातार नजरअंदाज करता रहा। दरअसल वह घर में कलेश के पक्ष में नहीं था। परिणाम यह हुआ कि निरंजनी को बल मिल गया। अब वह उसके सामने भी लक्ष्मण से चैटिंग कर लेती। धैर्य की भी कोई सीमा सीमा होती है। जब निरंजनी की बेहयायी हद पार कर गयी, तो सुमित ने निरंजनी के साथ सख्ती से पेश आने का फैसला कर लिया। इस दिशा में पहला काम किया, उसने 23 अक्टूबर को छोटी बहन और बेटे को आगरा भेज दिया। दरअसल वह उनके सामने निरंजनी के साथ कोई बखेड़ा नहीं चाहता था, क्योंकि उन बच्चों पर गलत असर पड़ सकता था। वहीं, इधर विगत कुछ दिनों से निरंजनी लगातार सुमित पर दवाब डाल रही थी कि वह उसे डरबन छोड़ आए। जबकि सुमित किसी न किसी बहाने टालमटोल कर दे रहा था। इस कारण निरंजनी, सुमित से नाराज थी। निरंजनी को डरबन नहीं भेजने के पीछे सुमित की दो मुख्य वजह थी। पहली, जनवरी में सुमित के छोटे भाई की शादी होनी थी। और दूसरी, सुमित को आशंका थी कि डरबन जाने के बाद निरंजनी पुनः भारत नहीं आएगी। वह लक्ष्मण से शादी कर लेगी, ऐसा भी उसका मानना था। बात 29 अक्टूबर,2011 की है। उस दिन शाम के समय सुमित घर पहुंचा, तो घर का दरवाजा सिर्फ भिडका हुआ था। अतः वह आसानी से अंदर आ गया। शायद निरंजनी भूलवश अंदर से दरवाजा बंद करना भूल गयी होगी, ऐसा उसे लगा। अंदर आने पर बेडरुम में उसकी नजर गयी, तो वह चैक पड़ा। सुमित के आने से बेखबर निरंजनी बेडरुम मे लेपटाॅप पर किसी से लाइव चैटिंग कर रही थी। वह बिल्कुल नग्नावस्था में थी। वेबकैम आॅन था और लेपटाॅप के स्क्रीन पर लक्ष्मण का चेहरा साफ नजर आ रहा था। स्पीकर भी खुला हुआ था। दोनों एक-दूसरे से अश्लील बातें कर रहे थे। यह दृश्य देखते ही सुमित का धैर्य जवाब दे गया। उसे अपने गुस्से पर नियंत्रण नहीं रहा। वह रसोई की तरफ बढ़ गया।
कैसे दिया कत्ल को अंजाम ?
रसोई से सुमित चाकू ले आया और उससे निरंजनी के जिस्म पर तबतक प्रहार करते रहा, जबतक वह लहूलुहान अवस्था में अचेत होकर फर्श पर गिर नहीं पड़ी। उसके बाद उसने लेपटाॅप की चार्जजिंग लीड से गला घोंटकर उसकी हत्या कर दी। फिर शव को बाथरुम में रख दिया और घर की अच्छी तरह साफ-सफाई कर दी। अगले दिन यानि 30 अक्टूबर की सुबह वह मार्केट से एक ट्राली बैग और एक हैंड बैग खरीद लाया। घर आने पर उसने ट्राली बैग में निरंजनी का शव रख दिया। जबकि हैंड बैग में खून लगे कपड़े और हत्या में इस्तमाल सामान रखे। अब उसे लाश को ठिकाने लगाना था, सहसा उसे शुभाशीष का ध्यान आया, जो दफ्तर में उसके साथ काम करता था। रोहिणी इलाके में रहने वाले शुभाशीष के पास सफेद कलर की एक मारुति,800 कार थी। फिर सुमित ने फोन कर शुभाशीष से कहा, ’’अपनी कार लेकर आ जाओ। मुझे अपने चचेरे भाई से मिलने जाना जरूरी है।’’ तो शाम करीब पांच बजे शुभाशीष कार लेकर सुमित के घर आ गया। सुमित ने दोनों बैग कार की पिछली डिक्की में रखे। उसके बाद दोनों कार में राई, सोनीपत की तरफ बढ़ गये। राई इलाके में श्यामपुर गांव के पास एक पेट्रोल पम्प नजर आने पर सुमित ने कार वहां रुकवा ली। फिर उसने दोनों बैग उतारे और शुभाशीष को यह कहकर वापस भेज दिया कि यहां से उसका भाई ले जाएगा। उसने भाई को फोन कर दिया है। शुभाशीष जब कार लेकर चला गया, तो सुमित पेट्रोल पम्प पर पहुंचा, जहां से उसने एक कैन में दो लीटर पेट्रोल लिए। फिर वह दोनों बैग और कैन लेकर पैदल ही करीब दो सौ मीटर दूर जंगल में आ गया, जहां चारों तरफ सन्नाटा था। वहां उसने दानों बैग को एक-दूसरे के उपर रखा और उसमें पेट्रोल छीड़ककर आग लगा दी। उस जगह वह करीब दो घंटे रहा, जबतक लाश जल नहीं गयी। फिर एक ट्रक से लिफ्ट लेकर सिंधु बोर्डर पहुंचा, जहां से एक टीएसआर में कश्मीरी गेट बस अड्डा आ गया। उसके बाद वहां से बस पकड़कर पुल प्रहलादपुर अपने घर आ गया। अगले दिन उसने बाथरुम के टाइल्स बदलवा दिया, क्योंकि लाश रखने के कारण उसमें खून लग गये थे।
                                पत्नी की बेहयाई के चलते एक शरीफ इंसान कातिल बन गया। पत्नी का कत्ल कर उसके शव को जला डालने वाले सुमित नामक व्यक्ति को अंत तक भरोसा था कि शायद उसकी पत्नी सही राह पर आ जाएगी। लेकिन, बेशर्मी की हदें पार कर चुकी पत्नी निरंजनी अपने पति की इसी कमजोरी को अपना हथियार बनाए हुए थी।

29 दिसंबर 2011



मेरा पति बलात्कारी है!

मेरा पति जुल्मी है

मेरे पति ने किया
मेरा बलात्कार

वाकई इन बातों को सुनकर कोई भी हैरान रह जाये.. लेकिन ये कोरी अफवाह नहीं बल्कि हकीकत है.. मामला राजस्थान के जयपुर का है..पंकज अग्रवाल नाम के इस शख्स पर बलात्कार का आरोप लगा है.. हैरानी की बात तो ये की बलात्कार का आरोप लगाने वाली कोई और महिला नहीं बल्कि खुद इसकी पत्नी है.. जयपुर पुलिस ने महिला की शिकायत पर मामला दर्ज कर आरोपी पंकज को गिरफ्तार कर लिया है..लेकिन बलात्कार के इस केस के बारे में जिसने भी सुना बस हैरान रह गया कि आखिर एक महिला ने अपनी ही पति पर बलात्कार का आरोप क्यों लगाया..

जयपुर के महेश नगर थाना इलाके के रहने वाले पंकज की शादी फरवरी 2010 में हुई थी.. शादी के बाद सबकुछ ठीक ठाक था.. लेकिन बाद में पति-पत्नी के बीच अनबन रहने लगी..पीड़िता ने लिखित शिकायत में कहा है कि पंकज ने उसे अपने घर में जोर जबरदस्ती से रखा था..उसके साथ पंकज मारपीट करता था..इतना ही नहीं पंकज ने तलाक के पेपर तैयार कर जबरन अपनी बीवी के उसपर साइन कराने के बाद...कोर्ट में दाखिल कर दिये लेकिन फिर भी वो अपनी पत्नी के जिस्म से खेलता रहा ..हालांकि बाद में पंकज अपनी पत्नी को उसके मायके छोड़कर आ गया..इस संबंध में महिला ने अपने पति के खिलाफ महेश नगर थाने में बलात्कार का मामला दर्ज कराया दिया..

पुलिस ने बिना वक्त जाया किए आरोपी के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है..पुलिस ने पंकज को गिरफ्तार कर लिया है लेकिन उसके चेहरे पर शिकन तक नहीं है..लेकिन बीवी के लगाए गए बलात्कार के आरोपों के बारे में जानकर हर कोई हैरान है..

11 दिसंबर 2011

तफ्तीश-पत्नी और बेटी को भी ले डूबा चरित्रहीन पप्पू चौधरी



शायद उपर वाले ने बबली के उपर खास मेहरबानी की थी तभी चार बच्चों की मां होने के बावजूद वह बिल्कुल नवयौवना दिखती थी। शादी-शुदा पप्पू चैधरी, बबली के पति असलम का सबसे अच्छा दोस्त था। एक दिन पप्पू चैधरी, पत्नी और बिटिया के साथ अपने घर में मृत पड़ा मिला। उन तीनों का किसी ने बेरहमी पूर्वक कत्ल कर दिया था। जब पुलिस ने घटना की एक-एक कड़ी को जोड़ते हुए मामले का खुलासा किया, तो तिहरे हत्याकांड का मुख्य सूत्रधार असलम था। आखिर असलम ने ऐसा क्यों किया? और कैसे हुआ मामले का खुलासा? पूरी कहानी जानने के लिए पढि़ए यह खास रिपोर्ट।
तीन लाश मिली
उस दिन तारीख थी 4 अक्टूबर, 2011 और समय दोपहर के सवा दो बजे थे। हरियाणा के फरीदाबाद जिला स्थित एनआईटी थाने की पुलिस को सूचना मिली, ‘‘मकान नंबर एफ-139, एसजीएम नगर में तीन लाशें पड़ी हैं। शायद कत्ल का मामला है।’’ चुकि इलाका एनआईटी थाने के अधीन था अतः सूचना मिलते ही थानाध्यक्ष सब इंसपेक्टर अब्दुल शहीद दल-बल के साथ मौका ए वारदात के लिए रवाना हो गये जहां पहुंचने में उन्हें बामुश्किल 15 मिनट का वक्त लगा। तीनों लाश मकान के पीछे वाले कमरे में पड़ी थी जिनके गले में कपड़े का फंदा लगा हुआ था। साफ था कि उनकी हत्या गला दबाकर की गयी है। कमरे के सारे सामान यथावत पड़े थे इसलिए घटना का कारण लूटपाट है इससे पुलिस को इंकार था। लाश की शिनाख्त किराएदार 30 वर्षीय पप्पू चैधरी, उसकी पत्नी 28 वर्षीया शोभा चैधरी और साढ़े तीन वर्षीया बिटिया कोमल के रूप में हुई। फरीदाबाद शहर स्थित एक एक्सपोर्ट कंपनी में काम करने वाला पप्पू चैधरी मूल रूप से गांव ककराल, थाना खतौली, जिला मुजफ्फरनगर (उत्तरप्रदेश) का रहने वाला था। उसके परिवार में सिर्फ इकलौता लड़का ढ़ाई वर्षीय गोल्ड सही सलामत था। सबसे पहले लाशों पर नजर उस मकान में रहने वाली एक अन्य किराएदार मीना की गयी जब वह ड्यूटी से कमरे पर लौटी। उस समय गोल्ड बेहद तेज-तेज रो रहा था तो वह जिज्ञासावश पप्पू चैधरी के कमरे में पहुंची। लेकिन अंदर का दृश्य देखते ही उसके मुंह से जोर की चीख निकल गयी। पप्पू, शोभा और कोमल मृत अवस्था में थे। जबकि गोल्ड मां से चिपककर बेतहाशा रोए जा रहा था। मीना की चीख सुनकर पास-पड़ोस के कई लोग वहां आ पहुंचे। फिर उनमें से किसी ने फोन कर घटना की सूचना पुलिस को दी तो पुलिस मौके पर पहुंची थी। घटना का कोई चश्मदीद गवाह नहीं था। बहरहाल थानाध्यक्ष अब्दुल शहीद ने तीनों लाशें अपने कब्जे में लीं और घटनास्थल की सभी जरूरी औपचारिकतायें पूरी करने के बाद इस बाबत थाने में हत्या का मुकदमा अपराध संख्या 220/11 पर धारा 302 भादवि के तहत दर्ज कर लिया। तीनों शवों को पोस्टमार्टम के लिए मुर्दाघर भेज भेज दिया। फिर एक विशेष टीम का गठन कर पुलिस ने मामले की पड़ताल शुरू की।
वारदात में किसी जानकार का हाथ
जांच के दौरान पुलिस टीम इस निष्कर्ष पर पहुंची कि हत्यारे का मकसद सिर्फ हत्या करना था। वारदात में किसी परिचित के हाथ से पुलिस को इंकार नहीं था क्योंकि वारदात को दोस्ताना अंदाज में अंजाम दिया गया था। आसपास किसी को घटना की भनक तक नहीं लगी थी।
कैसे हुआ तिहरे हत्याकांड का खुलासा?
पुलिस टीम ने पप्पू चैधरी के मोबाइल फोन के पिछले छह माह की काल डिटेल निकलवाकर पड़ताल की तो एक मोबाइल नंबर पर पुलिस का ध्यान ठहर गया। संदिग्ध नंबर पर पप्पू चैधरी की रोजाना कई-कई बार लंबी बातें हुई थीं। पुलिस टीम ने संदिग्ध नंबर की लोकेशन और उसके धारक का पता किया तो वह नंबर पप्पू चैधरी के नाम था। जबकि उस फोन का लोकेशन दिल्ली के तुगलकाबाद इलाके का था। चूंकि उस फोन का रात्रि लोकेशन रोजाना तुगलकाबाद का था इसलिए पुलिस टीम इस नतीजे पर पहुंची कि संदिग्ध नंबर का धारक तुगलकाबाद इलाके में कहीं रहता है। फिर पुलिस टीम ने उन लोगों से पुछताछ की जिनके मोबाइल पर संदिग्ध नंबर से फोन आए और गये थे। पता चला कि संदिग्ध नंबर का इस्तमाल मकान नंबर 2853, गली नंबर 32, तुगलकाबाद एक्सटेंशन (दिल्ली) में रहने वाली 28 वर्षीया एक युवती बबली कर रही है। अब इस संभावना को बल मिला कि शायद प्रेम चैधरी और बबली के बीच अनैतिक संबंध रहे होंगे। फिर पुलिस टीम बबली के घर पहुंची। बबली मिली। पूछताछ में पता चला कि वह उस किराए के मकान में पति असलम और अपने चार बच्चों के साथ रहती थी। असलम का जीजा 27 वर्षीय सलमान भी उनके साथ रहता था। असलम और सलमान के बारे में बबली ने बताया कि दोनों 3 अक्टूबर को अजमेर शरीफ गये थे जहां से वे अब तक नहीं लौटे हैं। 30 वर्षीय असलम पुत्र खैराती गांव डडेला, थाना फैजगंज, जिला बदायूं (उत्तरप्रदेश) का रहने वाला था। जबकि सलमान पुत्र इस्लाम गांव जुलेहपुरा, थाना व जिला बुलंदशहर (उत्तरप्रदेश) का रहने वाला था। दोनों दिल्ली के ओखला इलाके में स्थित एक एक्सपोर्ट कंपनी में काम करते थे। इस जानकारी के बाद पुलिस टीम उस कंपनी में पहुंची जहां दोनों काम करते थे। वहां पता चला कि दोनों 3 अक्टूबर से ड्यूटी से गैरहाजिर हैं। जबकि उनके सहकर्मियों ने पूछताछ में बताया कि असलम ओखला इलाके में हुए एक युवक के कत्ल के आरोप में वर्ष 2006 में जेल गया था। सलमान के बारे में पता चला कि वह भी वर्ष 2008 में ओखला इलाके में हुए एक युवक के कत्ल के आरोप में जेल जा चुका है। यह पुलिस के लिए एक अहम सुराग था। संभव था कि बबली से नाजायज संबंध रखने की खुदंक में असलम ने सलमान के साथ मिलकर इस वारदात को अंजाम दिया हो। अब पुलिस टीम सावधानी पूर्वक उनकी तलाश में लग गयी।
हत्या में प्रेमिका का पति गिरफ्तार
सलमान 10 अक्टूबर की शाम करीब पांच बजे उस समय पुलिस टीम के हत्थे चढ़ गया जब वह बबली से मुलाकात कर घर से बाहर निकल रहा था। फिर थाने में लाकर उससे मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की गयी तो वह जल्द टूट गया। बकौल सलमान वारदात में उसके अलावा असलम और शोएब शामिल थे। असलम के पड़ोस में रहने वाला 26 वर्षीय शोएब पुत्र शमीमुल्ला मूलतः शाहजहांपुर (उत्तरप्रदेश) का रहने वाला था और ओखला इलाके में एक एक्सपोर्ट कंपनी में काम करता था। वह सलमान का बहुत अच्छा दोस्त था। फिर पुलिस टीम ने सलमान की निशानदेही पर 11 अक्टूबर को तुगलकाबाद एक्सटेंशन इलाके से शोएब को गिरफ्तार कर लिया। जबकि असलम पुलिस के हाथ नहीं आया। शोएब ने सलमान से दोस्ती की वजह से वारदात में साथ उनका साथ दिया था।
हत्या की वजह
पप्पू चैधरी और बबली के बीच अबैध संबंध बन गये थे जिस पर असलम को एतराज था। असलम ने लोक-लाज का हवाला देते हुए बबली को काफी समझाया कि वह पप्पू चैधरी से दूरी बना ले। लेकिन बबली पर उसकी बातों का कोई असर नहीं पड़ा। उसका रिश्ता पप्पू चैधरी से पूर्ववत रहा। दरअसल वह पप्पू चैधरी की इतनी दीवानी थी कि उसकी खातिर वह पति का साथ भी छोड़ सकती थी। जब बबली की बेहयाई हद से पार हो गयी तो असलम का एक मन किया कि वह बबली की हत्या कर दे। लेकिन बच्चों के भविष्य के लिए उसने यह विचार त्याग दिया। दरअसल उसे लगा कि मां के बिना बच्चे अनाथ हो जाएंगे। फिर उसने असलम और शोएब के साथ मिलकर पप्पू चैधरी की हत्या का प्लान तैयार कर लिया।
कैसे दिया वारदात को अंजाम?
योजना के तहत 3 अक्टूबर, 2011 की रात करीब ग्यारह बजे असलम अपने साढ़ू सलमान और शोएब के साथ पप्पू चैधरी के घर पहुंचा। उसने पप्पू को बताया कि वे तीनों किसी काम से फरीदाबाद आए थे इसलिए मिलने चले आए। उस रात वे तीनों पप्पू के घर ठहर गये। असलम साथ में नशीली बर्फियों का एक डिब्बा ले गया था जिसमें से दो बर्फी उसने पप्पू को खिला दी। थोड़ी देर बाद जब नशे ने असर दिखाया तो पप्पू बिना खाना खाये सो गया। जबकि शोभा उन्हें व दोनों बच्चों को खाना खिलाने के बाद सो गयी। मध्य रात्रि में जब पप्पू उसकी पत्नी और दोनों बच्चों के साथ गहरी नींद में था तो उपयुक्त अवसर देखकर असलम ने सलमान और शोएब की मदद से कमरे में पड़ी तीन अलग-अलग चुन्नियों से पप्पू, शोभा और कोमल की गला घोंटकर हत्या कर दी। सबसे पहले शोभा को मारा। जबकि कोमल की हत्या अंत में की। गोल्ड की हत्या इसलिए नहीं की कि वह उन्हें नहीं पहचान सकता था। वारदात को अंजाम देने के बाद तीनो वहां से फरार हो गए थे।

सत्रह रूपये में पांच घंटे के लिए पुलिस इंस्पेक्टर उपलब्ध!


महंगाई की मार से जब आम जन त्राहि-त्राहि कर रहा है तब मांगे जाने की सूरत में पंजाब पुलिस मात्र सत्रह रूपये में अपने एक इंस्पेक्टर की सेवाएं पांच घंटों के लिए उपलब्ध करवाने तत्पर है। इस स्तर के अधिकारी से नीचे के रैंक के कर्मियों की सेवाएं तो और भी सस्ते दरों पर उपलब्ध हैं। और भी आश्चर्य की बात है कि पुलिस के लिए घोड़े की कीमत तीन हजार रूपये और ऊंट की मात्र अढ़ाई सौ रूपये ही है। और तो और चमचमाती गाडि़यों के इस युग में पुलिस ने साईकिल को भी अपनी सवारी घोषित किया है। यह किफायती जो है!
दुनिया बदल गई, पर पंजाब पुलिस अंग्रजों के समय में बनाए गए नियमों-कायदों में लिपटी बैठी है। दो-तीन साल पहले संशोधित पंजाब पुलिस रूल्स में पुलिस द्वारा प्रदत की जाने वाली सुरक्षा और उसकी आवा-जाही के लिए दरें तथा वाहनों का निर्धारण किया गया है। सवारी के लिए साईकिल के अलावा घोड़े तथा ऊंट का भी जिक्र है। जाहिर सी बात है कि कागजों पर पुलिस अपराधियों के पीछे अभी भी घोड़े को ऐड़ लगाती हुई और ऊंट हांकते हुए साईकिल के पैडलों पर जोर लगा रही है।
पंजाब पुलिस रूल्स के मुताबिक जन सेवाएं बहुत ही किफायती हैं। नियमों के मुताबिक अगर आपको सुरक्षा चाहिए तो आपको ऊंट या घुड़सवार यह साईकिल घसीटते हुए पुलिस वालों की सेवाएं हाजिर हैं। बस आपको इन वाहनों की कीमत के बराबर सुरक्षा राशि जमा करवानी होगी। यह राशि रिफंडेबल है। पुलिस की तरफ से यह तोहफा (!) आज से 89 वर्षों पूर्व इन वाहनों की तय कीमत पर उपलब्ध है। उस जमाने में घोड़ा तीन हजार और ऊंट मात्र अढ़ाई सौ रूपये में मिल जाता था। यह तो रही यातायात की बात और बात करते हैं पुलिस वालों द्वारा उपलब्ध करवाई गई सेवा के बदले वसूले जाने वाले शुल्क की। शादी, सामाजिक कार्यों अथावा खेल समारोहों व बैठकों आदि में सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए आयोजक पुलिस में आवेदन कर सकता है। अर्जी मंजूर हो जाने पर सुरक्षा मुहैया करवाई जाएगी लेकिन, इसके बदले में प्रार्थी से नकदी वसूल की जाएगी। इंस्पेक्टर रैंक के अधिकारी द्वारा की जाने वाली सुरक्षा के लिए आयोजक को दिन के समय पांच घंटों के लिए 17 रूपये और रात में चार घंटों के लिए इतनी ही राशि अदा करनी होगी। समयावधि बढ़ जाने पर पुलिस द्वारा वसूल किये जाने वाली राशि दोगुनी हो जाएगी। आईए, अब एक नजर इंस्पेक्टर रैंक से नीचे के अधिकारियों-कर्मचारियों की सेवाएं लेने वालों के द्वारा लिए जाने वाले चार्जेज पर भी एक नजर डाल लेते हैं। सब-इंस्पेक्टर के लिए दस रूपये, एएसआई के लिए आठ रूपये, हवलदार के लिए सात रूपये तथा सिपाही के लिए यह चार्ज छह रूपये निर्धारित है।
लकीर की फकीर पुलिस के कुछ अन्य नियम भी आऊट आॅफ डेटेड हो चुके हैं। पुलिस में भर्ती हो जाने के बाद जवानों को घोड़े, ऊंट तथा साईकिल उपलब्ध करवाने के प्रावधान विभाग नियमावली में हैं। जवानों को घोड़े के लिए तीन हजार और ऊंट के लिए अढ़ाई सौ रूपये बतौर सुरक्षा राशि जमा करवानी होती है। यह राशि रिफंडेबल है। साईकिल की कीमत का अंदाजा सुधि पाठक लगा लें। ज्ञात रहे कि पंजाब पुलिस नियमावली उत्तर भारत के अन्य राज्यों हिमाचल, दिल्ली तथा हरियाणा और केंद्र शासित चंडीगढ़ में लागू है।

19 नवंबर 2011

तफ्तीश-दिल्ली का डॉक्टर क्यों बना बीवी का कातिल




संपन्न और सुंस्कृत परिवार से ताल्लुक रखने वाले डॉक्टर चंद्र विभास और सुप्रिया तुषार की शादी एक-दूसरे की पसंद से हुई थी। दोनों चरित्र के धनी और काफी पढ़े-लिखे थे। चंद्र विभास दिल्ली के एक बड़े अस्पताल में सीनियर रेजीडेंट सर्जन था तो सुप्रिया ने इंजीनियरिंग और एमबीए का कोर्स कर रखा था। उन्हें न तो किसी चीज का अभाव था और ना किसी बात की परेशानी। लेकिन उनका साथ मात्र दस माह रहा क्योंकि सुप्रिया का कत्ल हो गया। जब कत्ल का खुलासा हुआ तो हत्यारा कोई और नहीं चंद्र विभास ही था। आखिर चंद्र विभास ने ऐसा क्यों किया? और वह कैसे चढ़ा पुलिस के हत्थे? पूरी कहानी जानने के लिए घटना के अतीत में जाना होगा।
पारिवारिक पृष्ठभूमि
एलआईसी कॉलोनी, दुमका, जिला दुमका (झारखंड) में सपरिवार रहने वाले देवेन्द्र प्रसाद झारखंड बिजली बोर्ड में असिस्टेंट इंजीनियर थे। सुप्रिया उनकी इकलौती संतान थी। उसने बीएसी तक पढ़ाई दुमका से की। फिर उसने जयपुर से बीटेक करने के बाद बंगलौर के एक नामचीन संस्थान से एमबीए का कोर्स किया। जबकि, देवघर (झारखंड) के रहने वाले चंद्र विभास के पिता वीपी साहा झारखंड बिजली बोर्ड में अधीक्षण अभियंता के पद से हाल ही में सेवानिवृत्त हुए थे। वीपी साहा की चार संतानों तीन लड़के और एक लड़की में चंद्र विभास दूसरे नंबर पर था। उसने कलकत्ता मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस फिर असम मेडिकल कलेज, डिब्रुगढ़ से वर्ष 2009 में एमएस (मास्टर ऑफ सर्जन) किया था। फिलहाल वह जुलाई, 2010 से दिल्ली नगर निगम के अधीन संचालित दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल में सीनियर रेजीडेंट डॉक्टर के पद पर कार्यरत था।
पसंद से शादी
सुप्रिया और चंद्र विभास की शादी उन दोनों की पसंद से 22 नवंबर, 2010 को बड़ी धूमधाम से दुमका में हुई थी। देवेन्द्र प्रसाद ने शादी में सार्मथ्य से अधिक खर्च किया था। उन्होंने भरपूर दान-दहेज देने के अलावा विदाई के समय नव दम्पत्ति को सफेद कलर की एक आई-20 कार भी भेंट की जिसका नंबर यूपी-16 एबी-4351 था। शादी में मध्यस्थ की भूमिका दुमका शहर में रहने वाले चंद्र विभास के एक रिश्तेदार ने निभाई जो देवेन्द्र प्रसाद के अच्छे जानकार थे। शादी के कुछ दिन बाद ही चंद्र विभाष अपनी पत्नी सुप्रिया को अपने साथ दिल्ली ले आया था। दोनों किराये के मकान नंबर ए-24(प्रथम तल), हरिनगर, दिल्ली में रहते थे। मकान अनिल जैन का था जो पड़ोस में ही सपरिवार रह रहे थे।
रिश्ते में खटास
दिल्ली आने के कुछ दिन बाद ही सुप्रिया के प्रति चंद्र विभास के व्यवहार में अचानक बदलाव आ गया। अब उसे सुप्रिया पसंद नहीं थी। वह बात-बात पर सुप्रिया को ताना देता कि मैं तुमसे शादी कर फंस गया। तुम मेरे से शादी लायक नहीं थी। उसके अलावा वह सुप्रिया को नौकरी करने देने के पक्ष में भी नहीं था। उसका कहना था कि उसके घर की रिवाज नहीं है कि घर की महिला बाहर जाकर नौकरी करे। जबकि सुप्रिया इतनी पढ़ाई के बाद घर बैठकर अपनी डिग्रियां बेकार नहीं करना चाहती थी। नतीजन दोनों में मन-मुटाव शुरू हो गया। फिर चंद्र विभास ने सुप्रिया को तंग करना और उसके साथ मार-पीट करना शुरू कर दिया। सारी बात सुप्रिया टेलीफोन के माध्यम से अपने माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्यों को बताती रहती थी। दोनों की गृहस्थी ठीक तरह से चले इसलिए सुप्रिया के माता-पिता ने चंद्र विभास को समझाने का प्रयास किया लेकिन, उसके व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया। सुप्रिया के प्रति उसका नजरिया पूर्ववत रहा। उसने शादी के मात्र दो माह बाद ही 6 फरवरी, 2011 को सुप्रिया को मारपीट कर घर से निकाल दिया सुप्रिया विवश होकर मायके आ गई। सुप्रिया के माता-पिता के काफी अनुनय-विनय के बाद भी चंद्र विभास उसे लेने नहीं आया। फिर दोनों के रिश्तेदारों ने पहल कर उनकी सुलह करावाई। उसके बाद 10 जुलाई, 2011 को चंद्र विभास सुप्रिया को दिल्ली ले आया। इस बार सुप्रिया अपनी सारी डिग्रियां और लैपटाॅप मायके में ही छोड़ आयी थी, ताकि घर में क्लेश न हो। लेकिन जिस दिन वह दिल्ली आई उसी दिन किसी बात पर चंद्र विभास ने उसकी पिटाई कर दी। वह अब हमेशा सुप्रिया को जलील करने लगा था। सुप्रिया ने अपनी परेशानी माता-पिता को बतायी तो उसके पिता देवेन्द्र प्रसाद 20 जुलाई को दिल्ली आए। उन्होंने चंद्र विभास से याचना की कि वह उनकी बिटिया को परेशान न करे और दोनों को समझा-बुझाकर वे पुनः दुमका लौट गये।
माता-पिता से सुप्रिया का संपर्क टूटा
सुप्रिया रोजाना फोन कर मायके वालों को अपनी खैरियत की जानकारी देती रहती थी। 23 सितंबर की दोपहर करीब ढाई बजे उससे फोन पर अंतिम बार मां निमाषा प्रसाद की बातचीत हुई तब सुप्रिया ने मां को बताया था कि चंद्र विभास उसके साथ मारपीट कर रहा है। उसके बाद सुप्रिया का कोई फोन मायके वालों के पास नहीं आया। ऐसे में उसके माता-पिता की चिंता जायज थी। उन्होंने कई बार सुप्रिया के मोबाइल पर फोन कर उससे संपर्क करने की कोशिश की लेकिन हर बार उसका मोबाइल फोन बंद मिला। जबकि चंद्र विभास को फोन करने पर वह किसी न किसी बहाने सुप्रिया से बातचीत कराने में टाल-मटोल कर रहा था।
हत्या की जानकारी मिली
देवेन्द्र प्रसाद किसी अनहोनी की आशंका से 25 सितंबर की शाम करीब आठ बजे दिल्ली पहुंचे। वे चंद्र विभास के कमरे पर पहुंचे तो वहां ताला लगा मिला। जबकि उन्हें पड़ोसियों और मकान मालिक से पूछताछ में पता चला कि 23 सितंबर की दोपहर करीब दो बजे गली में सुप्रिया और चंद्र विभास के बीच झगड़ा हुआ था। उसके बाद सुप्रिया किसी को दिखायी नहीं दी थी। अलबत्ता यह जानकारी मिली कि चंद्र विभास उस दिन के बाद उस शाम करीब सात बजे कमरे पर दिखायी दिया था। इतना पता चलने पर देवेन्द्र प्रसाद ने अपने स्तर से चंद्र विभास की काफी तलाश की पर वह उन्हें रात्रि दो बजे तक नहीं मिला। चुकि उसका मोबाइल सुबह से बंद था, इसलिए फोन पर भी उससे संपर्क नहीं हो सका। फिर देवेन्द्र प्रसाद अजन्ता गेस्ट हाउस आ गये जहां वे रात को रुके। अगले दिन सुबह देवेन्द्र प्रसाद जब चंद्र विभाष के कमरे में पहुंचे तो वह उन्हे मिल गया। जबकि सुप्रिया मौजूद नहीं थी। उसके बारे में पूछने पर चंद्र विभाष ने बताया कि वह बीती शाम उससे झगड़ा कर कहीं चली गयी। बकौल चंद्र विभाष उसने सुप्रिया को ढ़ूढ़ने की काफी कोशिश की पर वह उसे नहीं मिली थी। लेकिन चंद्र विभास की यह बात देवेन्द्र प्रसाद को हजम नहीं हुई। उन्हें लगा कि उनकी बिटिया के साथ जरूर कोई अनहोनी घटना घटी है जिसे चंद्र विभास छिपा रहा है। फिर उन्होंने समझदारी से काम लेते हुए चंद्र विभास को विश्वास में लिया, ‘‘बेटा! यदि अनजाने में तुमसे कोई गलती हो गयी हो तो मुझे साफ बता दो। भरोसा रखो, मैं तुम्हें माफ कर दूंगा।’’ देवेन्द्र प्रसाद ने सहानभूति का महलम लगाया, ‘‘आखिर तुम मेरे बेटे हो। कोई भी बाप अपने बेटे का अनिष्ट नहीं चाहेगा।’’ इतना सुनते ही चंद्र विभाष की आंखें भर आयी, ‘‘पापाजी, मुझे माफ कर दो। मेरे से बहुत बड़ी गलती हो गयी। मैने सुप्रिया को...।’’ उसने वाक्य पूरा नहीं किया और फफक-फफक कर रो पड़ा। देवेन्द्र प्रसाद के दिल की धड़कन बढ़ गयी, ‘‘कहां है सुप्रिया?’’ उन्होंने घबराहट भरे स्वर में पूछा, ‘‘वह सही सलामत तो है?’’ चंद्र विभाष खामोश रहा। देवेन्द्र प्रसाद ने सवाल कई बार दोहराया, पर चंद्र विभास ने कोई जवाब नहीं दिया। वह बेतहाशा रोये जा रहा था। फिर देवेन्द्र प्रसाद को समझते देरी नहीं लगी कि सुप्रिया के साथ जरूर कोई अनहोनी घटना घट चुकी है। अब उनका धैर्य जवाब दे गया था, ‘‘तुमने सुिप्रया को मार डाला?’’ उन्होंने सख्त तेवर में चंद्र विभाष के चेहरे की तरफ देखा, ‘‘तुम खामोश क्यों हो?’’ उनकी आंखें भर आई, ‘‘मेरे सवाल का जवाब दो?’’ तो चंद्र विभाष ने रोते हुए हौले से कहा, ‘‘पापाजी, अब सुप्रिया इस दुनिया में नहीं है। मेरे से अनजाने में गलती हो गयी...मुझे माफ कर दो।’’ इतना सुनते ही देवेन्द्र प्रसाद कुछ पल के लिए बिल्कुल जड़वत हो गये। फिर रुद्व गले से बोले, ‘‘तुमने बहुत गलत किया। आखिर तुमने ऐसा क्यों किया?...।’’ और वह उसी समय हरिनगर थाने के लिए निकल गये।
कत्ल में पति गिरफ्तार
देवेन्द्र प्रसाद ने हरीनगर थाने के इंसपेक्टर (तफ्तीश) हरपाल सिंह को पूरी बात बताई तो इंसपेक्टर सिंह उसी समय दल-बल के साथ चंद्र विभास के घर के लिए रवाना हो गए जहां पहुंचने में उन्हें बमुश्किल पंद्रह मिनट का वक्त लगा। लेकिल चंद्र विभास घर से फरार मिला। तो पुलिस ने उसके मोबाइल फोन को सर्विलांस पर लगा दिया। फिर पुलिस ने मोबाइल फोन की लोकेशन की मदद से उसे उसी शाम उसे हरिनगर इलाके से गिरफ्तार कर लिया। थाने में लाकर जब उससे मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की गई तो उसने सुप्रिया की हत्या की बात कबूल कर ली। बकौल चद्र विभास उसने सुप्रिया की हत्या कर उसका शव इलाहाबाद के पास फेंक दिया था।
क्यों किया कत्ल?
चंद्र विभास ने सुप्रिया से मनमुटाव के तीन मुख्य कारण बताये। पहला, सुप्रिया शारीरीक संबंध बनाना नहीं चाहती थी। जब चंद्र विभास जबरदस्ती संबंध बनाने की कोशिश करता, तो वह उसे बलात्कार के मुकदमें मे फंसा देने की धमकी देती। उसने शादी के दस माह में मात्र तीन बार संबंध बनाये थे वह भी चंद्र विभास के काफी अनुनय-विनय के बाद। दूसरा, वह घर के काम-काज में कन्नी काटती थी। उसका कहना था कि वह तीसरी कक्षा से छात्रावास में रही है इसलिए उससे घर का काम-काज नहीं हो सकता। और तीसरा यह कि जब एक बार दोनों के बीच झगड़ा हुआ तो सुप्रिया ने चंद्र विभास को पकड़वाने के लिए पुलिस को बुला लिया था। बकौल चंद्र विभास इन्हीं कारणों से 23 सितंबर की रात करीब साढ़े नौ बजे उसका सुप्रिया के साथ झगड़ा हुआ तो सुप्रिया ने उसे तमाचा जड़ दिया। फिर उसका गुस्सा नियंत्रण में नहीं रहा और उसने सुप्रिया का सिर फर्श पर दे मारा। सुप्रिया बेहोश हो गयी। उसके बाद उसने चुन्नी से गला घोंटकर उसकी हत्या कर दी थी। चंद्र विभास ने बताया कि उसने सुप्रिया का शव उसी कार में डालकर इलाहाबाद जिले के हांडिया में एक फ्लाईओवर के नीचे फंेक दिया था जो कार सुप्रिया के पिता ने उसे भेंट की थी।
सुप्रिया का शव बरामद
पुलिस चंद्र विभास को साथ लेकर हांडिया पहुंची और उस जगह की निशानदेही की जहां चंद्र विभास ने सुप्रिया का शव फंेका था। वहां लाश नहीं मिली। फिर पुलिस ने इस बाबत हांडिया थाने के थानाध्यक्ष ए के निगम से संपर्क किया तो पता चला कि उन्हें उस जगह 25 सितंबर की सुबह एक महिला की लाश मिली थी जिसकी शिनाख्त नहीं होने पर उन्होंने उसका शव पहचान के लिए स्थानीय मुर्दाघर में सुरक्षित रखवा दिया था। इस जानकारी के बाद वह शव देवेन्द्र प्रसाद को दिखाया गया तो उन्होंने उक्त लाश की शिनाख्त सुप्रिया के रूप में कर दी। पुलिस को दिए चंद्र विभास के बयानों पर विश्वास करें तो सुप्रिया का चरित्र पति नहीं निबाहने वाली पत्नी के रूप में सामने आता हैं। खूब पढ़े-लिखे होने के बावजूद दोनों वैवाहिक संबंधों को निबाहने में कामयाब नहीं रहे।