11 दिसंबर 2011

तफ्तीश-पत्नी और बेटी को भी ले डूबा चरित्रहीन पप्पू चौधरी



शायद उपर वाले ने बबली के उपर खास मेहरबानी की थी तभी चार बच्चों की मां होने के बावजूद वह बिल्कुल नवयौवना दिखती थी। शादी-शुदा पप्पू चैधरी, बबली के पति असलम का सबसे अच्छा दोस्त था। एक दिन पप्पू चैधरी, पत्नी और बिटिया के साथ अपने घर में मृत पड़ा मिला। उन तीनों का किसी ने बेरहमी पूर्वक कत्ल कर दिया था। जब पुलिस ने घटना की एक-एक कड़ी को जोड़ते हुए मामले का खुलासा किया, तो तिहरे हत्याकांड का मुख्य सूत्रधार असलम था। आखिर असलम ने ऐसा क्यों किया? और कैसे हुआ मामले का खुलासा? पूरी कहानी जानने के लिए पढि़ए यह खास रिपोर्ट।
तीन लाश मिली
उस दिन तारीख थी 4 अक्टूबर, 2011 और समय दोपहर के सवा दो बजे थे। हरियाणा के फरीदाबाद जिला स्थित एनआईटी थाने की पुलिस को सूचना मिली, ‘‘मकान नंबर एफ-139, एसजीएम नगर में तीन लाशें पड़ी हैं। शायद कत्ल का मामला है।’’ चुकि इलाका एनआईटी थाने के अधीन था अतः सूचना मिलते ही थानाध्यक्ष सब इंसपेक्टर अब्दुल शहीद दल-बल के साथ मौका ए वारदात के लिए रवाना हो गये जहां पहुंचने में उन्हें बामुश्किल 15 मिनट का वक्त लगा। तीनों लाश मकान के पीछे वाले कमरे में पड़ी थी जिनके गले में कपड़े का फंदा लगा हुआ था। साफ था कि उनकी हत्या गला दबाकर की गयी है। कमरे के सारे सामान यथावत पड़े थे इसलिए घटना का कारण लूटपाट है इससे पुलिस को इंकार था। लाश की शिनाख्त किराएदार 30 वर्षीय पप्पू चैधरी, उसकी पत्नी 28 वर्षीया शोभा चैधरी और साढ़े तीन वर्षीया बिटिया कोमल के रूप में हुई। फरीदाबाद शहर स्थित एक एक्सपोर्ट कंपनी में काम करने वाला पप्पू चैधरी मूल रूप से गांव ककराल, थाना खतौली, जिला मुजफ्फरनगर (उत्तरप्रदेश) का रहने वाला था। उसके परिवार में सिर्फ इकलौता लड़का ढ़ाई वर्षीय गोल्ड सही सलामत था। सबसे पहले लाशों पर नजर उस मकान में रहने वाली एक अन्य किराएदार मीना की गयी जब वह ड्यूटी से कमरे पर लौटी। उस समय गोल्ड बेहद तेज-तेज रो रहा था तो वह जिज्ञासावश पप्पू चैधरी के कमरे में पहुंची। लेकिन अंदर का दृश्य देखते ही उसके मुंह से जोर की चीख निकल गयी। पप्पू, शोभा और कोमल मृत अवस्था में थे। जबकि गोल्ड मां से चिपककर बेतहाशा रोए जा रहा था। मीना की चीख सुनकर पास-पड़ोस के कई लोग वहां आ पहुंचे। फिर उनमें से किसी ने फोन कर घटना की सूचना पुलिस को दी तो पुलिस मौके पर पहुंची थी। घटना का कोई चश्मदीद गवाह नहीं था। बहरहाल थानाध्यक्ष अब्दुल शहीद ने तीनों लाशें अपने कब्जे में लीं और घटनास्थल की सभी जरूरी औपचारिकतायें पूरी करने के बाद इस बाबत थाने में हत्या का मुकदमा अपराध संख्या 220/11 पर धारा 302 भादवि के तहत दर्ज कर लिया। तीनों शवों को पोस्टमार्टम के लिए मुर्दाघर भेज भेज दिया। फिर एक विशेष टीम का गठन कर पुलिस ने मामले की पड़ताल शुरू की।
वारदात में किसी जानकार का हाथ
जांच के दौरान पुलिस टीम इस निष्कर्ष पर पहुंची कि हत्यारे का मकसद सिर्फ हत्या करना था। वारदात में किसी परिचित के हाथ से पुलिस को इंकार नहीं था क्योंकि वारदात को दोस्ताना अंदाज में अंजाम दिया गया था। आसपास किसी को घटना की भनक तक नहीं लगी थी।
कैसे हुआ तिहरे हत्याकांड का खुलासा?
पुलिस टीम ने पप्पू चैधरी के मोबाइल फोन के पिछले छह माह की काल डिटेल निकलवाकर पड़ताल की तो एक मोबाइल नंबर पर पुलिस का ध्यान ठहर गया। संदिग्ध नंबर पर पप्पू चैधरी की रोजाना कई-कई बार लंबी बातें हुई थीं। पुलिस टीम ने संदिग्ध नंबर की लोकेशन और उसके धारक का पता किया तो वह नंबर पप्पू चैधरी के नाम था। जबकि उस फोन का लोकेशन दिल्ली के तुगलकाबाद इलाके का था। चूंकि उस फोन का रात्रि लोकेशन रोजाना तुगलकाबाद का था इसलिए पुलिस टीम इस नतीजे पर पहुंची कि संदिग्ध नंबर का धारक तुगलकाबाद इलाके में कहीं रहता है। फिर पुलिस टीम ने उन लोगों से पुछताछ की जिनके मोबाइल पर संदिग्ध नंबर से फोन आए और गये थे। पता चला कि संदिग्ध नंबर का इस्तमाल मकान नंबर 2853, गली नंबर 32, तुगलकाबाद एक्सटेंशन (दिल्ली) में रहने वाली 28 वर्षीया एक युवती बबली कर रही है। अब इस संभावना को बल मिला कि शायद प्रेम चैधरी और बबली के बीच अनैतिक संबंध रहे होंगे। फिर पुलिस टीम बबली के घर पहुंची। बबली मिली। पूछताछ में पता चला कि वह उस किराए के मकान में पति असलम और अपने चार बच्चों के साथ रहती थी। असलम का जीजा 27 वर्षीय सलमान भी उनके साथ रहता था। असलम और सलमान के बारे में बबली ने बताया कि दोनों 3 अक्टूबर को अजमेर शरीफ गये थे जहां से वे अब तक नहीं लौटे हैं। 30 वर्षीय असलम पुत्र खैराती गांव डडेला, थाना फैजगंज, जिला बदायूं (उत्तरप्रदेश) का रहने वाला था। जबकि सलमान पुत्र इस्लाम गांव जुलेहपुरा, थाना व जिला बुलंदशहर (उत्तरप्रदेश) का रहने वाला था। दोनों दिल्ली के ओखला इलाके में स्थित एक एक्सपोर्ट कंपनी में काम करते थे। इस जानकारी के बाद पुलिस टीम उस कंपनी में पहुंची जहां दोनों काम करते थे। वहां पता चला कि दोनों 3 अक्टूबर से ड्यूटी से गैरहाजिर हैं। जबकि उनके सहकर्मियों ने पूछताछ में बताया कि असलम ओखला इलाके में हुए एक युवक के कत्ल के आरोप में वर्ष 2006 में जेल गया था। सलमान के बारे में पता चला कि वह भी वर्ष 2008 में ओखला इलाके में हुए एक युवक के कत्ल के आरोप में जेल जा चुका है। यह पुलिस के लिए एक अहम सुराग था। संभव था कि बबली से नाजायज संबंध रखने की खुदंक में असलम ने सलमान के साथ मिलकर इस वारदात को अंजाम दिया हो। अब पुलिस टीम सावधानी पूर्वक उनकी तलाश में लग गयी।
हत्या में प्रेमिका का पति गिरफ्तार
सलमान 10 अक्टूबर की शाम करीब पांच बजे उस समय पुलिस टीम के हत्थे चढ़ गया जब वह बबली से मुलाकात कर घर से बाहर निकल रहा था। फिर थाने में लाकर उससे मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की गयी तो वह जल्द टूट गया। बकौल सलमान वारदात में उसके अलावा असलम और शोएब शामिल थे। असलम के पड़ोस में रहने वाला 26 वर्षीय शोएब पुत्र शमीमुल्ला मूलतः शाहजहांपुर (उत्तरप्रदेश) का रहने वाला था और ओखला इलाके में एक एक्सपोर्ट कंपनी में काम करता था। वह सलमान का बहुत अच्छा दोस्त था। फिर पुलिस टीम ने सलमान की निशानदेही पर 11 अक्टूबर को तुगलकाबाद एक्सटेंशन इलाके से शोएब को गिरफ्तार कर लिया। जबकि असलम पुलिस के हाथ नहीं आया। शोएब ने सलमान से दोस्ती की वजह से वारदात में साथ उनका साथ दिया था।
हत्या की वजह
पप्पू चैधरी और बबली के बीच अबैध संबंध बन गये थे जिस पर असलम को एतराज था। असलम ने लोक-लाज का हवाला देते हुए बबली को काफी समझाया कि वह पप्पू चैधरी से दूरी बना ले। लेकिन बबली पर उसकी बातों का कोई असर नहीं पड़ा। उसका रिश्ता पप्पू चैधरी से पूर्ववत रहा। दरअसल वह पप्पू चैधरी की इतनी दीवानी थी कि उसकी खातिर वह पति का साथ भी छोड़ सकती थी। जब बबली की बेहयाई हद से पार हो गयी तो असलम का एक मन किया कि वह बबली की हत्या कर दे। लेकिन बच्चों के भविष्य के लिए उसने यह विचार त्याग दिया। दरअसल उसे लगा कि मां के बिना बच्चे अनाथ हो जाएंगे। फिर उसने असलम और शोएब के साथ मिलकर पप्पू चैधरी की हत्या का प्लान तैयार कर लिया।
कैसे दिया वारदात को अंजाम?
योजना के तहत 3 अक्टूबर, 2011 की रात करीब ग्यारह बजे असलम अपने साढ़ू सलमान और शोएब के साथ पप्पू चैधरी के घर पहुंचा। उसने पप्पू को बताया कि वे तीनों किसी काम से फरीदाबाद आए थे इसलिए मिलने चले आए। उस रात वे तीनों पप्पू के घर ठहर गये। असलम साथ में नशीली बर्फियों का एक डिब्बा ले गया था जिसमें से दो बर्फी उसने पप्पू को खिला दी। थोड़ी देर बाद जब नशे ने असर दिखाया तो पप्पू बिना खाना खाये सो गया। जबकि शोभा उन्हें व दोनों बच्चों को खाना खिलाने के बाद सो गयी। मध्य रात्रि में जब पप्पू उसकी पत्नी और दोनों बच्चों के साथ गहरी नींद में था तो उपयुक्त अवसर देखकर असलम ने सलमान और शोएब की मदद से कमरे में पड़ी तीन अलग-अलग चुन्नियों से पप्पू, शोभा और कोमल की गला घोंटकर हत्या कर दी। सबसे पहले शोभा को मारा। जबकि कोमल की हत्या अंत में की। गोल्ड की हत्या इसलिए नहीं की कि वह उन्हें नहीं पहचान सकता था। वारदात को अंजाम देने के बाद तीनो वहां से फरार हो गए थे।

सत्रह रूपये में पांच घंटे के लिए पुलिस इंस्पेक्टर उपलब्ध!


महंगाई की मार से जब आम जन त्राहि-त्राहि कर रहा है तब मांगे जाने की सूरत में पंजाब पुलिस मात्र सत्रह रूपये में अपने एक इंस्पेक्टर की सेवाएं पांच घंटों के लिए उपलब्ध करवाने तत्पर है। इस स्तर के अधिकारी से नीचे के रैंक के कर्मियों की सेवाएं तो और भी सस्ते दरों पर उपलब्ध हैं। और भी आश्चर्य की बात है कि पुलिस के लिए घोड़े की कीमत तीन हजार रूपये और ऊंट की मात्र अढ़ाई सौ रूपये ही है। और तो और चमचमाती गाडि़यों के इस युग में पुलिस ने साईकिल को भी अपनी सवारी घोषित किया है। यह किफायती जो है!
दुनिया बदल गई, पर पंजाब पुलिस अंग्रजों के समय में बनाए गए नियमों-कायदों में लिपटी बैठी है। दो-तीन साल पहले संशोधित पंजाब पुलिस रूल्स में पुलिस द्वारा प्रदत की जाने वाली सुरक्षा और उसकी आवा-जाही के लिए दरें तथा वाहनों का निर्धारण किया गया है। सवारी के लिए साईकिल के अलावा घोड़े तथा ऊंट का भी जिक्र है। जाहिर सी बात है कि कागजों पर पुलिस अपराधियों के पीछे अभी भी घोड़े को ऐड़ लगाती हुई और ऊंट हांकते हुए साईकिल के पैडलों पर जोर लगा रही है।
पंजाब पुलिस रूल्स के मुताबिक जन सेवाएं बहुत ही किफायती हैं। नियमों के मुताबिक अगर आपको सुरक्षा चाहिए तो आपको ऊंट या घुड़सवार यह साईकिल घसीटते हुए पुलिस वालों की सेवाएं हाजिर हैं। बस आपको इन वाहनों की कीमत के बराबर सुरक्षा राशि जमा करवानी होगी। यह राशि रिफंडेबल है। पुलिस की तरफ से यह तोहफा (!) आज से 89 वर्षों पूर्व इन वाहनों की तय कीमत पर उपलब्ध है। उस जमाने में घोड़ा तीन हजार और ऊंट मात्र अढ़ाई सौ रूपये में मिल जाता था। यह तो रही यातायात की बात और बात करते हैं पुलिस वालों द्वारा उपलब्ध करवाई गई सेवा के बदले वसूले जाने वाले शुल्क की। शादी, सामाजिक कार्यों अथावा खेल समारोहों व बैठकों आदि में सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए आयोजक पुलिस में आवेदन कर सकता है। अर्जी मंजूर हो जाने पर सुरक्षा मुहैया करवाई जाएगी लेकिन, इसके बदले में प्रार्थी से नकदी वसूल की जाएगी। इंस्पेक्टर रैंक के अधिकारी द्वारा की जाने वाली सुरक्षा के लिए आयोजक को दिन के समय पांच घंटों के लिए 17 रूपये और रात में चार घंटों के लिए इतनी ही राशि अदा करनी होगी। समयावधि बढ़ जाने पर पुलिस द्वारा वसूल किये जाने वाली राशि दोगुनी हो जाएगी। आईए, अब एक नजर इंस्पेक्टर रैंक से नीचे के अधिकारियों-कर्मचारियों की सेवाएं लेने वालों के द्वारा लिए जाने वाले चार्जेज पर भी एक नजर डाल लेते हैं। सब-इंस्पेक्टर के लिए दस रूपये, एएसआई के लिए आठ रूपये, हवलदार के लिए सात रूपये तथा सिपाही के लिए यह चार्ज छह रूपये निर्धारित है।
लकीर की फकीर पुलिस के कुछ अन्य नियम भी आऊट आॅफ डेटेड हो चुके हैं। पुलिस में भर्ती हो जाने के बाद जवानों को घोड़े, ऊंट तथा साईकिल उपलब्ध करवाने के प्रावधान विभाग नियमावली में हैं। जवानों को घोड़े के लिए तीन हजार और ऊंट के लिए अढ़ाई सौ रूपये बतौर सुरक्षा राशि जमा करवानी होती है। यह राशि रिफंडेबल है। साईकिल की कीमत का अंदाजा सुधि पाठक लगा लें। ज्ञात रहे कि पंजाब पुलिस नियमावली उत्तर भारत के अन्य राज्यों हिमाचल, दिल्ली तथा हरियाणा और केंद्र शासित चंडीगढ़ में लागू है।

19 नवंबर 2011

तफ्तीश-दिल्ली का डॉक्टर क्यों बना बीवी का कातिल




संपन्न और सुंस्कृत परिवार से ताल्लुक रखने वाले डॉक्टर चंद्र विभास और सुप्रिया तुषार की शादी एक-दूसरे की पसंद से हुई थी। दोनों चरित्र के धनी और काफी पढ़े-लिखे थे। चंद्र विभास दिल्ली के एक बड़े अस्पताल में सीनियर रेजीडेंट सर्जन था तो सुप्रिया ने इंजीनियरिंग और एमबीए का कोर्स कर रखा था। उन्हें न तो किसी चीज का अभाव था और ना किसी बात की परेशानी। लेकिन उनका साथ मात्र दस माह रहा क्योंकि सुप्रिया का कत्ल हो गया। जब कत्ल का खुलासा हुआ तो हत्यारा कोई और नहीं चंद्र विभास ही था। आखिर चंद्र विभास ने ऐसा क्यों किया? और वह कैसे चढ़ा पुलिस के हत्थे? पूरी कहानी जानने के लिए घटना के अतीत में जाना होगा।
पारिवारिक पृष्ठभूमि
एलआईसी कॉलोनी, दुमका, जिला दुमका (झारखंड) में सपरिवार रहने वाले देवेन्द्र प्रसाद झारखंड बिजली बोर्ड में असिस्टेंट इंजीनियर थे। सुप्रिया उनकी इकलौती संतान थी। उसने बीएसी तक पढ़ाई दुमका से की। फिर उसने जयपुर से बीटेक करने के बाद बंगलौर के एक नामचीन संस्थान से एमबीए का कोर्स किया। जबकि, देवघर (झारखंड) के रहने वाले चंद्र विभास के पिता वीपी साहा झारखंड बिजली बोर्ड में अधीक्षण अभियंता के पद से हाल ही में सेवानिवृत्त हुए थे। वीपी साहा की चार संतानों तीन लड़के और एक लड़की में चंद्र विभास दूसरे नंबर पर था। उसने कलकत्ता मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस फिर असम मेडिकल कलेज, डिब्रुगढ़ से वर्ष 2009 में एमएस (मास्टर ऑफ सर्जन) किया था। फिलहाल वह जुलाई, 2010 से दिल्ली नगर निगम के अधीन संचालित दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल में सीनियर रेजीडेंट डॉक्टर के पद पर कार्यरत था।
पसंद से शादी
सुप्रिया और चंद्र विभास की शादी उन दोनों की पसंद से 22 नवंबर, 2010 को बड़ी धूमधाम से दुमका में हुई थी। देवेन्द्र प्रसाद ने शादी में सार्मथ्य से अधिक खर्च किया था। उन्होंने भरपूर दान-दहेज देने के अलावा विदाई के समय नव दम्पत्ति को सफेद कलर की एक आई-20 कार भी भेंट की जिसका नंबर यूपी-16 एबी-4351 था। शादी में मध्यस्थ की भूमिका दुमका शहर में रहने वाले चंद्र विभास के एक रिश्तेदार ने निभाई जो देवेन्द्र प्रसाद के अच्छे जानकार थे। शादी के कुछ दिन बाद ही चंद्र विभाष अपनी पत्नी सुप्रिया को अपने साथ दिल्ली ले आया था। दोनों किराये के मकान नंबर ए-24(प्रथम तल), हरिनगर, दिल्ली में रहते थे। मकान अनिल जैन का था जो पड़ोस में ही सपरिवार रह रहे थे।
रिश्ते में खटास
दिल्ली आने के कुछ दिन बाद ही सुप्रिया के प्रति चंद्र विभास के व्यवहार में अचानक बदलाव आ गया। अब उसे सुप्रिया पसंद नहीं थी। वह बात-बात पर सुप्रिया को ताना देता कि मैं तुमसे शादी कर फंस गया। तुम मेरे से शादी लायक नहीं थी। उसके अलावा वह सुप्रिया को नौकरी करने देने के पक्ष में भी नहीं था। उसका कहना था कि उसके घर की रिवाज नहीं है कि घर की महिला बाहर जाकर नौकरी करे। जबकि सुप्रिया इतनी पढ़ाई के बाद घर बैठकर अपनी डिग्रियां बेकार नहीं करना चाहती थी। नतीजन दोनों में मन-मुटाव शुरू हो गया। फिर चंद्र विभास ने सुप्रिया को तंग करना और उसके साथ मार-पीट करना शुरू कर दिया। सारी बात सुप्रिया टेलीफोन के माध्यम से अपने माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्यों को बताती रहती थी। दोनों की गृहस्थी ठीक तरह से चले इसलिए सुप्रिया के माता-पिता ने चंद्र विभास को समझाने का प्रयास किया लेकिन, उसके व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया। सुप्रिया के प्रति उसका नजरिया पूर्ववत रहा। उसने शादी के मात्र दो माह बाद ही 6 फरवरी, 2011 को सुप्रिया को मारपीट कर घर से निकाल दिया सुप्रिया विवश होकर मायके आ गई। सुप्रिया के माता-पिता के काफी अनुनय-विनय के बाद भी चंद्र विभास उसे लेने नहीं आया। फिर दोनों के रिश्तेदारों ने पहल कर उनकी सुलह करावाई। उसके बाद 10 जुलाई, 2011 को चंद्र विभास सुप्रिया को दिल्ली ले आया। इस बार सुप्रिया अपनी सारी डिग्रियां और लैपटाॅप मायके में ही छोड़ आयी थी, ताकि घर में क्लेश न हो। लेकिन जिस दिन वह दिल्ली आई उसी दिन किसी बात पर चंद्र विभास ने उसकी पिटाई कर दी। वह अब हमेशा सुप्रिया को जलील करने लगा था। सुप्रिया ने अपनी परेशानी माता-पिता को बतायी तो उसके पिता देवेन्द्र प्रसाद 20 जुलाई को दिल्ली आए। उन्होंने चंद्र विभास से याचना की कि वह उनकी बिटिया को परेशान न करे और दोनों को समझा-बुझाकर वे पुनः दुमका लौट गये।
माता-पिता से सुप्रिया का संपर्क टूटा
सुप्रिया रोजाना फोन कर मायके वालों को अपनी खैरियत की जानकारी देती रहती थी। 23 सितंबर की दोपहर करीब ढाई बजे उससे फोन पर अंतिम बार मां निमाषा प्रसाद की बातचीत हुई तब सुप्रिया ने मां को बताया था कि चंद्र विभास उसके साथ मारपीट कर रहा है। उसके बाद सुप्रिया का कोई फोन मायके वालों के पास नहीं आया। ऐसे में उसके माता-पिता की चिंता जायज थी। उन्होंने कई बार सुप्रिया के मोबाइल पर फोन कर उससे संपर्क करने की कोशिश की लेकिन हर बार उसका मोबाइल फोन बंद मिला। जबकि चंद्र विभास को फोन करने पर वह किसी न किसी बहाने सुप्रिया से बातचीत कराने में टाल-मटोल कर रहा था।
हत्या की जानकारी मिली
देवेन्द्र प्रसाद किसी अनहोनी की आशंका से 25 सितंबर की शाम करीब आठ बजे दिल्ली पहुंचे। वे चंद्र विभास के कमरे पर पहुंचे तो वहां ताला लगा मिला। जबकि उन्हें पड़ोसियों और मकान मालिक से पूछताछ में पता चला कि 23 सितंबर की दोपहर करीब दो बजे गली में सुप्रिया और चंद्र विभास के बीच झगड़ा हुआ था। उसके बाद सुप्रिया किसी को दिखायी नहीं दी थी। अलबत्ता यह जानकारी मिली कि चंद्र विभास उस दिन के बाद उस शाम करीब सात बजे कमरे पर दिखायी दिया था। इतना पता चलने पर देवेन्द्र प्रसाद ने अपने स्तर से चंद्र विभास की काफी तलाश की पर वह उन्हें रात्रि दो बजे तक नहीं मिला। चुकि उसका मोबाइल सुबह से बंद था, इसलिए फोन पर भी उससे संपर्क नहीं हो सका। फिर देवेन्द्र प्रसाद अजन्ता गेस्ट हाउस आ गये जहां वे रात को रुके। अगले दिन सुबह देवेन्द्र प्रसाद जब चंद्र विभाष के कमरे में पहुंचे तो वह उन्हे मिल गया। जबकि सुप्रिया मौजूद नहीं थी। उसके बारे में पूछने पर चंद्र विभाष ने बताया कि वह बीती शाम उससे झगड़ा कर कहीं चली गयी। बकौल चंद्र विभाष उसने सुप्रिया को ढ़ूढ़ने की काफी कोशिश की पर वह उसे नहीं मिली थी। लेकिन चंद्र विभास की यह बात देवेन्द्र प्रसाद को हजम नहीं हुई। उन्हें लगा कि उनकी बिटिया के साथ जरूर कोई अनहोनी घटना घटी है जिसे चंद्र विभास छिपा रहा है। फिर उन्होंने समझदारी से काम लेते हुए चंद्र विभास को विश्वास में लिया, ‘‘बेटा! यदि अनजाने में तुमसे कोई गलती हो गयी हो तो मुझे साफ बता दो। भरोसा रखो, मैं तुम्हें माफ कर दूंगा।’’ देवेन्द्र प्रसाद ने सहानभूति का महलम लगाया, ‘‘आखिर तुम मेरे बेटे हो। कोई भी बाप अपने बेटे का अनिष्ट नहीं चाहेगा।’’ इतना सुनते ही चंद्र विभाष की आंखें भर आयी, ‘‘पापाजी, मुझे माफ कर दो। मेरे से बहुत बड़ी गलती हो गयी। मैने सुप्रिया को...।’’ उसने वाक्य पूरा नहीं किया और फफक-फफक कर रो पड़ा। देवेन्द्र प्रसाद के दिल की धड़कन बढ़ गयी, ‘‘कहां है सुप्रिया?’’ उन्होंने घबराहट भरे स्वर में पूछा, ‘‘वह सही सलामत तो है?’’ चंद्र विभाष खामोश रहा। देवेन्द्र प्रसाद ने सवाल कई बार दोहराया, पर चंद्र विभास ने कोई जवाब नहीं दिया। वह बेतहाशा रोये जा रहा था। फिर देवेन्द्र प्रसाद को समझते देरी नहीं लगी कि सुप्रिया के साथ जरूर कोई अनहोनी घटना घट चुकी है। अब उनका धैर्य जवाब दे गया था, ‘‘तुमने सुिप्रया को मार डाला?’’ उन्होंने सख्त तेवर में चंद्र विभाष के चेहरे की तरफ देखा, ‘‘तुम खामोश क्यों हो?’’ उनकी आंखें भर आई, ‘‘मेरे सवाल का जवाब दो?’’ तो चंद्र विभाष ने रोते हुए हौले से कहा, ‘‘पापाजी, अब सुप्रिया इस दुनिया में नहीं है। मेरे से अनजाने में गलती हो गयी...मुझे माफ कर दो।’’ इतना सुनते ही देवेन्द्र प्रसाद कुछ पल के लिए बिल्कुल जड़वत हो गये। फिर रुद्व गले से बोले, ‘‘तुमने बहुत गलत किया। आखिर तुमने ऐसा क्यों किया?...।’’ और वह उसी समय हरिनगर थाने के लिए निकल गये।
कत्ल में पति गिरफ्तार
देवेन्द्र प्रसाद ने हरीनगर थाने के इंसपेक्टर (तफ्तीश) हरपाल सिंह को पूरी बात बताई तो इंसपेक्टर सिंह उसी समय दल-बल के साथ चंद्र विभास के घर के लिए रवाना हो गए जहां पहुंचने में उन्हें बमुश्किल पंद्रह मिनट का वक्त लगा। लेकिल चंद्र विभास घर से फरार मिला। तो पुलिस ने उसके मोबाइल फोन को सर्विलांस पर लगा दिया। फिर पुलिस ने मोबाइल फोन की लोकेशन की मदद से उसे उसी शाम उसे हरिनगर इलाके से गिरफ्तार कर लिया। थाने में लाकर जब उससे मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की गई तो उसने सुप्रिया की हत्या की बात कबूल कर ली। बकौल चद्र विभास उसने सुप्रिया की हत्या कर उसका शव इलाहाबाद के पास फेंक दिया था।
क्यों किया कत्ल?
चंद्र विभास ने सुप्रिया से मनमुटाव के तीन मुख्य कारण बताये। पहला, सुप्रिया शारीरीक संबंध बनाना नहीं चाहती थी। जब चंद्र विभास जबरदस्ती संबंध बनाने की कोशिश करता, तो वह उसे बलात्कार के मुकदमें मे फंसा देने की धमकी देती। उसने शादी के दस माह में मात्र तीन बार संबंध बनाये थे वह भी चंद्र विभास के काफी अनुनय-विनय के बाद। दूसरा, वह घर के काम-काज में कन्नी काटती थी। उसका कहना था कि वह तीसरी कक्षा से छात्रावास में रही है इसलिए उससे घर का काम-काज नहीं हो सकता। और तीसरा यह कि जब एक बार दोनों के बीच झगड़ा हुआ तो सुप्रिया ने चंद्र विभास को पकड़वाने के लिए पुलिस को बुला लिया था। बकौल चंद्र विभास इन्हीं कारणों से 23 सितंबर की रात करीब साढ़े नौ बजे उसका सुप्रिया के साथ झगड़ा हुआ तो सुप्रिया ने उसे तमाचा जड़ दिया। फिर उसका गुस्सा नियंत्रण में नहीं रहा और उसने सुप्रिया का सिर फर्श पर दे मारा। सुप्रिया बेहोश हो गयी। उसके बाद उसने चुन्नी से गला घोंटकर उसकी हत्या कर दी थी। चंद्र विभास ने बताया कि उसने सुप्रिया का शव उसी कार में डालकर इलाहाबाद जिले के हांडिया में एक फ्लाईओवर के नीचे फंेक दिया था जो कार सुप्रिया के पिता ने उसे भेंट की थी।
सुप्रिया का शव बरामद
पुलिस चंद्र विभास को साथ लेकर हांडिया पहुंची और उस जगह की निशानदेही की जहां चंद्र विभास ने सुप्रिया का शव फंेका था। वहां लाश नहीं मिली। फिर पुलिस ने इस बाबत हांडिया थाने के थानाध्यक्ष ए के निगम से संपर्क किया तो पता चला कि उन्हें उस जगह 25 सितंबर की सुबह एक महिला की लाश मिली थी जिसकी शिनाख्त नहीं होने पर उन्होंने उसका शव पहचान के लिए स्थानीय मुर्दाघर में सुरक्षित रखवा दिया था। इस जानकारी के बाद वह शव देवेन्द्र प्रसाद को दिखाया गया तो उन्होंने उक्त लाश की शिनाख्त सुप्रिया के रूप में कर दी। पुलिस को दिए चंद्र विभास के बयानों पर विश्वास करें तो सुप्रिया का चरित्र पति नहीं निबाहने वाली पत्नी के रूप में सामने आता हैं। खूब पढ़े-लिखे होने के बावजूद दोनों वैवाहिक संबंधों को निबाहने में कामयाब नहीं रहे।

11 अगस्त 2011

तीन दुकानों के ताले टूटे, पत्रकार का लैपटॉप, कैमरा चोरी

नरेला थाना इलाके में चोरों ने एक ही रात में तीन दुकानों के ताले तोड़कर हजारों रूपये के माल और नकदी पर हाथ साफ कर दिया। वारदात पुलिस कालोनी के सामने स्थित एक प्लाजा में हुई। एक अन्य मामले में अज्ञात बदमाश एक पत्रकार की कार का शीशा तोडकर लैपटॉप, कैमरा तथा टाटा फोटोन और कैसेट्स आदि उड़ा ले गए। वारदात दिन में करीब ग्यारह बजे अति व्यस्त नरेला टर्मिनल पर हुई।

जानकारी के मुताबिक पॉकेट-9, सेक्टर ए-5, नरेला उपनगर स्थित एक प्लाजा की तीन दुकानों पर रात में सेंधमारों ने धावा बोल दिया। दुकानों के शटर तोड़कर सेंधमार हजारों रूपये नकद तथा मोबाईल फोन और कंप्यूटर आदि उड़ा ले गए। सेंधमारी का पता गुरूवार सुबह चला जब किसी व्यक्ति ने दुकानदारों को उनकी दुकानों के शटर टूटे होने की सूचना दी। जिन दुकानों को सेंधमारों ने निशाना बनाया वे पुलिस कालोनी के सामने बनी हुई हैं।

एक अन्य वारदात नरेला बस टर्मिनल पर हुई। जिसमें अज्ञात चोर एक समाचार चैनल के रिपोर्टर राजेश खत्री की कार का शीशा तोड़कर उसमें रखा लैपटॉप तथा कैमरा आदि निकाल ले गए। कार मालिक गाड़ी को अपने भाई की दुकान के सामने खड़ी करके एटीएम से पैसा निकलवाने के लिए गया। दस मिनट बाद जब खत्री वापस आया तो उसे वारदात की जानकारी मिली। मामलों की पुलिस द्वारा जांच की जा रही है।

डीसीपी को मिठाई परोसना पड़ा महंगा, एसएचओ लाईन हाजिर

नरेला, नई दिल्ली।। दौरे पर आए डीसीपी की आवभगत करना नरेला थाना प्रभारी को महंगा पड़ गया। उसे तुरंत प्रभाव से लाईन हाजिर कर दिया गया। विभागीय कार्रवाई की अन्य वजहें जनता के प्रति थाना पुलिस का गैर जिम्मेदाराना रवैया और कार्य में अनियमितताएं बताई गई हैं। उपायुक्त ने थाना प्रभारी के निलंबन की पुष्टि की है।

जानकारी के मुताबिक बाहरी जिला पुलिस उपायुक्त भोलानाथ जायसवाल नरेला थाना के औचक निरीक्षण पर आए थे। उनके थाने में आने के जरा देर बाद ही स्थानीय पुलिस ने इलाके के एक मशहूर हलवाई की मिठाईयों आदि से उनकी सेवा करनी शुरू कर दी। आवभगत मामले में पुलिस की तत्परता देखकर उपायुक्त आग-बबूला हो गए और उन्होनें थाने का रिकॉर्ड चेक करना शुरू कर दिया। हत्या तथा लूट आदि के कई मामलों में प्रगति ना देख उन्होनें इलाके के घोषित अपराधियों के संबंधी में जानकारी मांगनी शुरू कर दी। इस मामले में भी थाना प्रभारी से जवाब देते ना बना। इस पर सख्त कदम उठाते हुए डीसीपी ने थाना प्रभारी सतीश दहिया को तुरंत प्रभाव से लाईन हाजिर कर दिया। उल्लेखनीय है कि गत माह डीसीपी के जनता दरबार के दौरान थाना पुलिस की कार्यप्रणाली से नाराज डीसीपी ने अपने मोबाईल फोन का नंबर लोगों को नोट करवाकर सीधे शिकायत करने को कह दिया था।

22 जुलाई 2011

आतंक के मासूम हथियार

ये खबर दुनिया भर के मां-बाप के माथे पर शिकन ला सकती है..हर मां-बाप को परेशान कर सकती हैं..क्योंकि उनके बच्चों पर अब आतंकियों की नजर पड़ चुकी है..आतंकी अब बच्चों को जेहाद के नाम पर उकसाने की साजिश रच रहे हैं..इसके लिए अल-कायदा ने हथियार बनाया है कार्टून फिल्म्स को..जी हां..अल-कायदा एनिमेटिड कार्टून फिल्मों के जरिए मासूम बच्चों के दिलो दिमाग में आतंक भरना चाहता है..अल-कायदा चाहता है कि बच्चों को आतंक की फिल्म दिखाकर उनके दिमाग को अपने काबू में किया जा सके..अलकायदा के आतंकियों को बखूबी मालूम है कि कार्टून फिल्म मासूम बच्चों के दिलो दिमाग पर किस कदर छा जाती हैं..बस इसी बात का फायदा अलकायदा उठाना चाहता है..इसके लिए अल-कायदा ने एक एनिमेटिड फिल्म तैयार कराई है.. इस फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे मासूम बच्चें जेहाद के नाम पर खून बहा सकते हैं..वो कैसे ट्रेनिंग लेकर कत्लेआम मचा सकते हैं..इस फिल्म को अबु अल लैथ एल येमन ने तैयार किया है...इतना ही नहीं अलकायदा ने अपनी जेहाद नाम से जारी एक वेबसाइट पर आतंक फैलाने की खातिर बच्चों के लिए तैयार की गई फिल्म का जिक्र किया है..और साफ लफ्जों में लिखा है कि बच्चों को अपने संगठन में भर्ती करने के लिए ऐसा किया गया है..वेबसाइट पर कुछ तस्वीरें भी जारी कि गई हैं..अलकायदा अच्छी तरह जानता है कि बच्चों को दिलो दिमाग में जेहाद की बात भरकर वो आतंक में उनका इस्तेमाल कर सकता है..और दुनिया के विभिन्न हिस्सों में धमाके करा सकता है..वेबसाइट पर अरबी भाषा में कुछ निर्देश भी दिए गए हैं..मंसूबा खौफनाक है..और लादेन की मौत के बाद अलकायदा पहले ही बौखलाया हुआ है..लिहाजा अल-कायदा किसी भी सूरत में दुनिया को दहलाना चाहता है..

14 जुलाई 2011

हाईप्रोफाइल सेक्स रैकेट का भंडाफोड़


दिल्ली पुलिस ने बुधवार को राजधानी में चले रहे जिस सेक्‍स रैकेट का पर्दाफाश किया है वह अबतक का सबसे हाई प्रोफाइल और सबसे बड़ा सेक्‍स रैकेट है। दिल्‍ली पुलिस ने बुधवार को मुखबिर की सहायता से देह व्‍यापार में लिप्‍त पांच लड़कियों सहित सात लोगों को गिरफ्तार किया है जिसमें दो दलाल भी शामिल हैं। पुलिस ने गिरोह के पास से ऑडी कार बरामद की है। कॉल गर्ल्स महंगी ऑडी कार में चलती थीं और हाईप्रोफाइल ग्राहकों को फांसती थीं। खास बात ये है कि इस गिरोह ने दक्षिणी दिल्ली के ही महरौली इलाके में चार लक्जरी फ्लैट खरीद रखे थे और पूरा रैकेट वहीं से चलाया जाता था। पकड़े गए दो दलाल कॉलगर्ल्स रैकेट चलाने वाली मशहूर सोनू पंजाबन के चचेरे भाई है। पकड़ी गई लड़कियों में से एक मुंबई की रहने वाली है।
दिल्‍ली पुलिस के हत्‍थे चढ़ी हाईप्रोफाइल सेक्स रैकेट की सरगना नगमा खान दुबई की रहने वाली है। ऐसा माना जा रहा है कि पूर्व में गिरफ्तार हुई अबतक की सबसे बड़ी सेक्‍स सरगना सोनू पंजाबन ने अपनी कमान नगमा को सौंप दी थी। पूरे मामले में खास बात यह है कि सोनू के बाद नगम ने जब कमान सौंपा तो उसने इस धंधे को ऑर्गेनाइज्‍ड कर दिया और एक कॉरपोरेट की तरह इसे चलाने लगी। नगमा लड़कियों के बदले ग्राहकों से एक रात के 15 से 50 हजार रुपये तक वसूलती थी।
ग्राहकों द्वारा दिए गये रकम में कॉलगर्ल्‍स का कोई हिस्‍सा नहीं होता था बल्कि नगमा उन्‍हें सैलरी देती थी। आप सुनकर शायद चौक जाएं कि नगमा लड़कियों को उनकी प्रोफाइल के अनुसार 1 लाख से 1.5 लाख रुपये तक सैलरी देती थी। नगमा उन लड़कियों को ज्‍यादा पैसे देती थी जो मुंबई, पूणे, गोवा, और बैंगलोर आकर ग्राहकों को खुश करती थी। पुलिस को शक है कि इस गिरोह में कई और बड़े नाम भी शामिल हो सकते हैं। फिलहाल इनका नेटवर्क खंगाला जा रहा है।
पूछताछ में पुलिस को इस बात का भी पता चला कि नगमा ने कॉलगर्ल्‍स की एक कैटगरी बाट रखी थी। नगमा ने लड़कियों को तीन श्रेणी 1 एक्‍स, 2 एक्‍स और 3 एक्‍स ग्रेड दिया हुआ था। 1 एक्‍स वाली कॉलगर्ल्‍स की कीमत सबसे कम (5 से 10 हजार रुपये) होती थी और वह गरीब परिवार और बैकवर्ड जगहों से संबंध रखती थी। 2 एक्‍स की श्रेणी में उसने मध्‍यमवर्गीय कॉलेज स्‍टूडेंट्स को रखा था जिसकी एक रात की कीमत 15 हजार रुपये थे। नगमा ने 3 एक्‍स श्रेणी में जिन युवतियों को रखा था उनकी कीमत 50 हजार से 75 हजार रुपये थी और मुबई की मॉडल थी।
नगमा उन्‍हें पांच सितारा होटलों और रेव पार्टियों में भी लड़कियों की सप्लाई करती थी। नगमा ने ग्राहकों के लिए बकायदा पैकेज बनाए हुए थे। मसलन एक लाख में एक हफ्ते के लिए छुट्टियों का पैकेज। गिरोह के तार दिल्ली-मुंबई व लखनऊ तक फैले हैं। वह हर दो माह में अपना ठिकाना बदलती थी। वह खुद ऑडी कार से चलती थी। उसके पास ए-4 सीरीज की कई लग्जरी कारें हैं। वह हर बार नया साल विदेशों में मनाने जाती है।
पुलिस के मुताबिक इस सेक्स रैकेट में दिल्ली की कुख्यात सेक्स रैकेट सरगना सोनू पंजाबन के दो चचेरे भाई भी गिरप्तार किए गए हैं। खुद पकड़ी गई लड़कियां भी चिल्ला चिल्ला कर कैमरे पर सोनू पंजाबन का नाम ले रही हैं। तो क्या जेल में बंद सोनू पंजाबन का भी इस सेक्स रैकेट से कुछ लेना देना है या फिर उसके भाई अब सोनू का धंधे को देख रहे हैं।
सूत्रों की माने तो इस रैकेट की सरगना नगमा असल में दिल्ली में सोनू पंजाबन के लिए ही काम कर रही है। मकोका एक्ट जेल में बैठी सोनू पंजाबन ने गिरफ्तारी के बाद नगमा को अपनी कमान सौंपी। जानकारी के मुताबिक सोनू पंजाबन के हाई प्रोफाइल ग्राहकों से सोनू के जरिए नगमा ने संपर्क साधा। सोनू नगमा को सेक्स रैकेट चलाने में अपनी एक्सपर्टीज के जरिए मदद करती है।